जैविक
खेती
हमारे देशमे एक बहुत बड़ी विटंबना है। जो किसान खेतोंमें अनाज पैदा करता है, वही सबसे ज्यादा भूका रहता है। यह हमारे सिस्टम की नाकामी का बड़ा नमूना है।
हमारे देशमे एक बहुत बड़ी विटंबना है। जो किसान खेतोंमें अनाज पैदा करता है, वही सबसे ज्यादा भूका रहता है। यह हमारे सिस्टम की नाकामी का बड़ा नमूना है।
हमारे
देश में जैविक खेती का संकल्पना नयी
नहीं है। आपको जानकर हैरानी होगी के हमारे प्राचीन
काल में भी इसका प्रयोग
हो रहा था !
लेकिन जनसंख्या विस्फोट की वजह से बढती हुई मांग के चलते रासायनीक खेती का आरंभ हुआ, क्यूंकि कम समय में ज्यादा उपज मिलती थी, मगर यह खेत जमीन और इंसान की सेहत लिए हानिकारक होने लगी।
लेकिन जनसंख्या विस्फोट की वजह से बढती हुई मांग के चलते रासायनीक खेती का आरंभ हुआ, क्यूंकि कम समय में ज्यादा उपज मिलती थी, मगर यह खेत जमीन और इंसान की सेहत लिए हानिकारक होने लगी।
इसका
मूल उद्देश्य यही था के जैविक
कचरा और जैव उर्वरक,
जो मिटटी में घुलकर खाद का काम करते
है, उससे खेत की जमीन उपजाऊ
होती है। जैविक खाद से न सिर्फ
खेत उत्पाद बढ़ता है साथ ही
प्रदुषण मुक्त वातावरण भी बन जाता है।
विदेशोंमें इसे ग्रीन फार्मिंग कहा जाता
है।
जैविक
खेती में कीटनाशक, उर्वरक, हार्मोन आदि हानिकारक घटको का इस्तेमाल नहीं
होता।
जैविक
खेती में फसल की उत्पाद बदली
जाती है ,जैविक अपशिष्ट याने जैविक कचरा, खेत की खाद, चट्टान
की एडिटिव याने वो तत्त्व जो
चट्टान के घटक को
कृत्रिम तरीकेसे बढ़ाते है, और फसल के
अवशेष याने सुखी डालिया, पत्ते आदि पोषक तत्वोका इस्तेमाल किया जाता है और पौधोंको
सुरक्षित किया जाता है ।
दूसरे
शब्दों में कहे तो जैविक खेती
में कुदरती तत्वोका इस्तेमाल करके उत्पाद लिया जाता है। जिससे हम न सिर्फ
खेत जमीं को उपजाऊ बनाते
है, लेकिन हमें स्वस्थ और ऊँची जात
की फसल भी मिलती है। ताकि कृषि उत्पाद को इतना बढ़ाया
जाये के यह व्यवहारिक
हो।
देश
में हरित क्रांति जो डॉ. एम्
एस स्वामीनाथन जी लाये थे,
उसके फायदे अब एक ऊंचाई
तक पहुंचे थे और अब
उसके फ़ायदों का ग्राफ निचे निचे आता रहा था। इसीलिए कोई वैकल्पिक तकनीक की जरुरत हुई
थी।
इसके
अलावा इस हरित क्रांति
में जरुरत से ज्यादा इस्तेमाल
होती हुई रासायनिक उर्वरको (FERTILIZERS) कारण और खेत उत्पाद
को अनैसर्गिक तरीके से बढ़ने के तरीके से
एक ऐसी परिस्थिति निर्माण होते गयी जिसे हम प्रदुषण कह
सकते है। इन रासायनिक उर्वरको
के कारण न सिर्फ लोगो के
सेहत पर बुरा असर
होने लगा, साथ ही खेत की जमीन और
हवा में भी यह रासायनिक
तत्त्व नुकसान पहुंचाने लगे।
इंसानी
जीवन और प्रकृति संसाधन
में संतुलन जमा रहे इसीलिए इस दिशा में
प्रयास सुरु हुए।
जीवाश्म
ईंधन याने फॉसिल फ्युएल के नष्ट होने
की स्थिति और इसके पुनरूज्जीवन
होने की क्षमता न
होने के कारण खेती
के नए तरीके खोजे
गए, जो हमारे कुदरत
के लिए भी फायदेमंद हो।
क्या है
जैविक
खेती
की
संकल्पना
?
जैविक
खेती एक मूल संकल्पना
है। इनके निम्नलिखित सिद्धांत है।
१.
मिटटी एक अपने आप
में जीवन है।
२.
प्रकृति अपने आप में खेती
सीखने वाली संस्था है, जिसे किसी भी बाहरी तत्वोकी,
यहाँ तक के उसे
अतिरिक्त पानी की भी जरुरत
नहीं है।
३.
प्रकृति के तरीकोंपर जैविक
खेती निर्भर है। जैविक खेती से पौष्टिक तत्वोंको
मिट्टीसे अलग नहीं किया जाता है और न
ही मिटटी के गुणवत्ता स्तर
को, बढ़ती हुई इंसानी जरुरत के लिए घटाया
जाता है।
४. मिटटी के जिव और पोषण तत्त्व कायम रहते है। मिट्टीके प्राकृतिक सूक्ष्म जीव भी सुरक्षित रहते है।
५. मिटटी ही जैविक खेती का आधार है। मिटटी का स्वास्थ और उसके घटक इस जैविक खेती का हिस्सा है।
इस प्रकार जैविक खेती, खेती की एक ऐसी प्रणाली है जिसका उद्देश्य मिट्टी को जीवित रखना है ,उसका स्वास्थ भी कायम तंदुरुस्त रखना है । खेती करना और फसल उगाना उसका ध्येय है । साथ ही प्रदुषण
न हो और प्राकृतिक तत्वोंको सुरक्षित रखे यह भी इसका ध्येय है।
जैविक खेती की प्रमुख
विशेषताएं :
१. मिट्टी की उर्वरता की रक्षा करना।
२. कार्बनिक
पदार्थों के स्तर को बनाए रखना।
३. मिटटी में जैविक गतिविधि को प्रोत्साहित करना।
४. सूक्ष्मजीव की गतिविधि के माध्यम से पोषक तत्व प्रदान करना।
५. मिट्टी की नाइट्रोजन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बिजो का उपयोग करना।
६. कार्बनिक
पदार्थोंका जैविक तथा खाद की तरह पुनर्चक्रण किया जाय।
७. प्राकृतिक
शिकारियों, जैविक खाद, फसल का बारी-बारी उगाना, विविधता को बनाए रखना, प्रतिरोधी किस्में बढ़ाना आदि तरीको से खेत जमीं में किटक, जंगली घास और किसी भी बीमारियों को काबू रखना।
८. पशुधन के प्रबंध के लिए उनकी पोषक आवश्यकताओं, रहने की व्यवस्था, प्रजनन, पालन पर विशेष ध्यान देना।
भारत में जैविक खेती को अधिकतम बढ़ावा दिया जा रहा है।
इनका तीन स्तरोमे वर्गीकरण किया जाता है।
श्रेणी १. : किसानोंके उन क्षेत्र में जहा उपज कम या नहीं के बराबर है उनके लिए जैविक खेती जीवन का एक तरीका है। यह उनके द्वारा युगों से चली आ रही है और कृषि करने का एक पारंपरिक तरीका है।
श्रेणी २. : पारम्परिक कृषि पद्धतियों के दुष्प्रभाव और उर्वरकों या रासायनिक खाद के दुरुपयोग
के कारण, हाल ही में जैविक खेती अपनाने वाले किसान इस श्रेणी में आते हैं।
श्रेणी ३. : व्यावसायिक दृष्टी से बाजार पर अपना नियंत्रण रखने के लिए जिन किसानो ने जैविक कृषि अपनाई है वे इस तीसरी श्रेणी में आते है।
अधिकांश किसान पहली श्रेणी में आते हैं, लेकिन वे प्रमाणित
किसान या सर्टिफाइड
किसान नहीं होते हैं। प्रमाणित किसान याने वो किसान जो अपनी उपज बाजार में बिना किसिस अवरोध के, बेचने के लिए प्रमाणित हो। याने इस पहली श्रेणी में आने वाले किसान वो होते है जो यातो अपनी खुद की गरज के लिए उत्पाद करता है या वो प्रमाणित बाजार के अलावा कही और या किसी और को अपना उत्पाद बेचते है।
प्रमाणित किसान तीसरी श्रेणी में हैं जबकि प्रमाणित और गैर-प्रमाणित किसान दोनों को दूसरी श्रेणी में शामिल किया गया है।
हमारे
देश में फ़िलहाल जो समस्या है
वो इस तरह है
:
१.
मिटटी की रोगाणु की
शक्ति ख़त्म होती जा रही है
और साथ ही कार्बनिक पदार्थ
काम होते जा रहे है
इसलिए मिटटी का स्वास्थ मरने
की कगार पर है।
२.
जागतिक स्टार पर पृथ्वी का
बढ़ता तापमान।
३.
भूस्तर में काम होते जा रहे पानी
का स्तर
४.
खेती के लिए बढ़ते
खर्चे के मुकाबले काम
होते जाती उत्पादन की आय।
इन
मुद्दोंपर हमें इन बातो पर
ध्यान देना है। उत्पादक, टिकाऊ और लागत प्रभावी
प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।
१.
बारिश के पानी का
जतन :
बारिश
के पानी का जतन इस
विषय पर विचार करते
हुए जैविक खेती में एक महत्वपूर्ण कदम
है कि सिंचाई का
एकमात्र स्रोत मौसमी बारिश, स्थानीय तालाब, झीलें और कुएँ हैं।
इसलिए, टैंकोलेशन टैंक, खेत तालाबों को खोदा जाना
चाहिए। साथ ही खेती कोंटर
तरीकेसे की जाय।
२.
मिटटी का संवर्धन :
चुकी
मिटटी में जीवन है, उसे हमेशा समृद्ध रखना चाहिए। जिसके लिए फसल के अवशेष, पशु
की विष्टा और जितना भी
जैविक कचरा उपलब्ध हो, सभी कुछ मिट्टीमे फिर मिलाना चाहिये। यही
पुनर्चक्र है। हर वो पोषक
चीजे जो मिटटी से
मिली है उसे फिरसे
मिटटी में मिलाना जरुरी है।
जैव
उर्वरकों, खाद, जैव पोषक तत्वों आदि का उपयोग करना
चाहिए।
३.
तापमान बनाये रखना :
ग्रीन
हाउस के चलते जागतिक
वातावरण का तापमान बढ़ते
जा रहा है, इसीलिए खेतो के बांध पर
या अगल-बगल पर पेड़ लगाने
चाहिए, या खेत को
ढकना चाहिए।
४.
सौर ऊर्जा का अधिकतम उपयोग :
बायो
गैस, सौर ऊर्जा जैसे गैर-पारम्परिक ऊर्जा का खेतो के
लिए अधिकतम उपयोग करना
चाहिए। रोटेशन
तरीके से याने फसल
को बदलते रखना चाहिए।
किटक
नाशक या सिंथेटिक खाद
से मिटटी की प्राकृतिक शक्ति
को बचाना चाहिए।
पशु,
मुर्गिया आदि के विष्टा से
मिटटी की सेहत बानी
रहती है इसलिए मवेशी
तथा मुर्गियों की खेत के
लिए बेहद जरुरत है।
५.
अन्य तकनीक :
कुछ विशिष्ट प्रकार के केचुए, खुद
को विकसित करने वाले बीज, वनस्पति अर्क और तरल खादों
का उपयोग आदि अन्य तकनीकी है जिसका खेत
उत्पाद को बढ़ने में
मदत मिलती है।
V वा
⌂⌂⌂


1 comment:
बहुत अच्छा लिखा है...विषय के बारे मैं व विस्त्रित जानकारी देने के लिए धन्यवाद। जैविक खेती को बढ़ावा मिलना ही चाहिए, यह सबके लिए लाभदायक है। बहुत अच्छी लेखनी। बहुत शुभकामनायेंमंजरी अग्रवाल
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