Friday, May 8, 2020

मोबाईल आँखे - भाग - १


Galaxy Tree wallpaper by LeMacSP - 29 - Free on ZEDGE™VILAS
हमारा ब्रह्माण्ड कई घटको से भरा हुआ है।
सबसे पहिले हम धूमकेतु की बात करते है जो हम आम इंसानो को सबसे ज्यादा मोहित करता है।
धूमकेतु विशालकाय जमा हुआ गैस, पथ्थर और धूल से बना हुआ है।
पहले जानते है के किस तरह इन् धूमकेतु का नाम:करण होता है।
धूमकेतु का नाम रखना भी एक जटिल कार्य होता है। आम तौर पर धूमकेतु की खोज करने वाला वैज्ञानिक या किसी अवकाश यान का नाम दिया जाता है।     
गत शताब्दी में अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ ने (International Astronomical Union) नाम रखने के दिशानिर्देश दिए है। 
शूमेकर-लेवि 9 धूमकेतु की खोज युगें, कैरोलिन शूमेकर और डेविड लेवि ने की थी। यह धूमकेतु कम अवधि काल जीने वाला खोजा हुआ ९ वा धूमकेतु था
वैज्ञानिक के मुकाबले अवकाश यान धूमकेतु को ढूंढ़ने में ज्यादा समर्थ होते है इसीलिए लीनियर, सोहो वाइज जैसे अवकाश यान के नाम ज्यादा पाए जाते है। 

धुमकेतू का स्वरुप:
जब किसी धूमकेतु की परिक्रमा सूरज की और उसे खेचती है तो सूरज की गर्मी से उसके बर्फ के गोले को एक बड़े सर में परिवर्तित करता है जिसका आकार अंडाकार बन जाता है, जो हमारे ग्रहो से भी बड़ा बन जाता है और बाकि का हिस्सा एक दुम जैसा बन जाता है जिस मे धूल और गैस होते है।
याने जब तक वह सूर्य की परिक्रमा से दूर होता है तब उसका आकार गोलाकार रहता है और जब वह सूर्य की करीब आता है तब उसका आकार अंडाकार बन जाता है जो वाकई में अद्भुत है! मगर जैसे वह सुरज की अौर बढता है वैसे वैसे वह नष्ट हो जाता है। 
इसकी दूम लाखो मील लम्बी होती है।
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हमारे सौर मंडल को क्विपर बेल्ट ने घेरा है। इस पट्टेमें खरबो धूमकेतु है, या कहे के यह धूमकेतु का एक घर है। फ़िलहाल इंसान को मात्र ,६३३ धूमकेतु के बारे में ही पता है !

Fig 2

इसके अलावा ऊर्ट क्लाउड में इससे भी कई मात्रा मे अनगिनत धूमकेतु है। ऊर्ट क्लाउड हमारे सौर मंडल का बाहरी आवरण है जो एक रिंग की भाती क्विपर बेल्ट को घेरे हुए है।
पुराने दिनों में धूमकेतु को लम्बे बाल वाला या सफेद दाढी वाला तारा माना जाता था, जो बिना बताये, बिना किसी उम्मीद के, आसमान पर टपकता था।
चीन के खगोलशास्त्री सदियों से काफी बड़े पैमाने पर धूमकेतु का ब्यौरा लिखते आये थे, साथ ही धूमकेतु की पुंछ की विशेषताओं का चित्रण भी उन्होने नमूद किया गया है। साथ ही धूमकेतु कब आता था, कितने काल के लिए आकाश में रहता था और कब सूरज के करीब आकर नष्ट होता था, उनका अवकाश में कहा स्थान था,  उसका सुरज की अौर कैसा सफर रहा, कब विनाश हुआ, इन सारी बातोंका विवरण वे रखते थे।
इन धूमकेतु का वर्षक्रमिक इतिहास आने वाले खगोल शास्त्रियों के लिए बेहद कीमती साधन बना। 
हम सभी जानते है के ४.६ खरबो साल पहले जब हमारे सौर मंडल की उत्पत्ति हुई तब उसमे से जो भी कचरा अवकाश में एक बड़े धमाके से फेंका गया था, उसी से कइ धूमकेतुओ की उत्पत्ति हुई थी 
धुमकेतू के विशालकाय और अनगिनत बर्फ के गोले पर घने कार्बनिक तत्व का आवरण चढ़ा होता है, इसीलिए उन्हें बर्फ के गंदे गोले भी कहा जाता है। 
यह धूमकेतु हमारी सौर मंडल की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिए बेहतर स्त्रोत माना जाता है। इनमे शायद पानी और कार्बनिक यौगिक याने केमिकल कंपाऊंड के घटक हो सकते है जो जीवन के आरम्भ के लिए जरुरी है, जिससे हमारी पृथ्वी पर जीवन का आरंभ हुआ ।शायद बाकि ग्रहो पर भी जीव का संभवीत आरम्भ   हुआ।  
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कहा से आते है यह धूमकेतु?
10 Things to Know About the Kuiper Belt – NASA Solar System ...Fig 3 
१९५१ में खगोल शास्त्री गेरार्ड क्विपर के सिद्धांत के अनुसार नेप्च्यून गृह के आगे बर्फ से भरी एक महा विशालकाय तश्करी के आकार का बेल्ट है, जिसमे अनगिनत काले धूमकेतु प्लूटो के क्षेत्र के करीब से हमारे सौर मंडल की परिक्रमा कर रहे है। यह बर्फीले टुकड़े कभी कभी गुरुत्वाकर्षण से सूरज की और खींचे चले आते है। इन्ही को हम धूमकेतु कहते है। सूरज की प्रतिक्रमा पूरी करने में इन्हे २०० साल से कम समय लगता है। हमारे सौर मंडल में इन धूमकेतु का अस्तित्व होने की बात हम मानते है क्यूंकि वे पहले हमारे करीब से गुजरे थे। लेकिन जो धूमकेतु ऊर्ट क्लाउड से आते है, जिसका अंतरसौर मंडल के सूरज और पृथ्वी के बिच के अंतर के एक लाख गुना जितना है, उनके आने के बारे में निश्चित से कुछ कहना मुश्किल है क्यूंकि ऊर्ट क्लाउड के धूमकेतु को सूर्य की परिक्रमा पूरी करने के लिए ३०० लाख साल लगते है !
हर धूमकेतु की नाभिक होती है, जिसे न्यूक्लियस (nucleus) कहते है। इसका आकार कुछ किलोमीटर जितना होता है। इसमें बर्फ से भरा होता है, साथ ही जमी हुई गैस और धूल के बादल भी होते है।  
जैसे ही वह सूरज के पास आता है, सूरज की गर्मी से वह निश्चेतावस्था की वायुमंडल, जिसे कोमा कहते है, उसमें परिवर्तित होता है। सूरज की गर्मी से उसकी गैस वायुमंडल को और बढाती है, उसका फैलावा बढ़ता जाता है। यह कोमा जो धूमकेतु का अभिन्न अंग है, लाखो किलोमीटर जितना लम्बा होता है।     
सूर्य किरण और तेजी से बहते सौर वायु के दबाव से कोमा के धूल और गैस को सूरज से दूर ढकेलते है, जिसे हम धूमकेतु की पुंछ कहते है।
पर कई लोगों को यह पता नहीं के धूमकेतु की एक नहीं, दो पुंछ होती है! एक धूल की और एक गैस की
Fig 4
Haily Comet                              

कई धूमकेतु सूरज से काफी दूर से सफर करते है, हैली नामक धूमकेतु सूरज से ८९० लाख किलोमीटर दुरी से गुजरा था। 
 Fig 5
Haily Comet

                                                            Fig 6 Sangrezar Comet
पर Sangrezar नामक धूमकेतु सीधे सूरज से टकरा कर ख़त्म हुआ, सूरज की गर्मी से उसका बाफ में परिवर्तन हुआ।                

धूमकेतु का अभ्यास :
वैज्ञानिक हैली धूमकेतु की नाभिक की १९८६ की तस्वीर से काफी ग्रस्त हुए थे। सन २००१ में नासा का डीप स्पेस वन अवकाश यान, बोरेल्ली धूमकेतु के करीब से गुजरा और उसने नाभिक की कई तस्वीरें ली। इस धुमकेतू की लम्बाई केवल किलोमीटर थी ।
 
Fig 7 

Nucleus of Wild 2 Comet

जनवरी २००४ में नासा के स्टारडस्ट मिशन के अंतर्गत कॉमेट वाइल्ड- के नाभिक से केवल २३६ किलोमीटर से उसके कणो को लिया गया, साथ ही तारो के बीच से  रज के नमूने लिए और दो साल बाद नमुने लेकर वापस धरती पर लौटा।
इसके जो फोटो लिए गए उसमे कही धूल का जेट दिखाई दे रहा था तो कही उबड़ खाबड़ बनावट वाली सतह तस्वीर मे दिख रही थी।
स्टारडस्ट के नमूने की जाँच पड़ताल में यही पता चला के धूमकेतु के बारे मे जो सोचा गया था उससे कई गुना अधिक जटिल इसकी रचना है।  
सूरज के पास वाले ग्रहो में जो खनिज पाए गए है वही खनिज इस नमूने में पाए गए है, जो यही बताते है की यह खनिज सौरमंडल से सफर करते हुए इन बाहरी क्षेत्र में, जहा धूमकेतु का निर्माण होता है वहा तक पहुंचे।
डीप इम्पेक्ट नामक नासा मिशन में एक ऐसा अवकाश यान भेजा गया जो सिर्फ धूमकेतु के करीब से गुज़रने के लिए बनाया था, उसके साथ में इम्पैक्टर था।  VILAS
जुलाई २००५ में इम्पैक्टर टेम्पल- नामक धूमकेतु के नाभिक से टकराने के लिए छोड़ा गया था । वह टकराने से भाप बन गया और उसमे धूमकेतु के स्तर के नीचे से महीन और पावडर जैसे तत्त्व निकले थे। इम्पैक्टर ने टकराने से पहिले इस धूल की कई तस्वीरें भी ली थी।  https://www.youtube.com/watch?v=bU4-p-0NCEE 
जिसकी वजह से इस धूमकेतु की कई बाते सामने आयी। करीब से गुजरने वाले अवकाश यान के दो कैमरा और स्पेक्ट्रोमीटर ने बेहद नाटकीय तरीके से उत्खनन को रेकॉर्ड किया, जिसकी वजह से नाभिक की आतंरिक रचना और बाहरी रचना की विस्तृत जानकारी हमें मिली।   
इस बेहद सफलता पूर्ण प्राथमिक मिशन के बाद डीप इम्पेक्ट अवकाश यान तथा स्टारडस्ट अवकाश यान अगले मिशन के लिए, दूसरे धूमकेतु के क़रीब से जाने के लिए पुनर्लक्षीत प्लान किया गया।
डीप इम्पेक्ट मिशन और एपोक्सी-EPOXI (Extrasolar Planet Observation and Deep Impact Extended Investigation) - एपोक्सी के दो प्रोजेक्ट थे। डिक्सी- Deep Impact Extended Investigation (DIXI) ने नोवेम्बर २०१० में हार्टले नामक धूमकेतु पर आक्रमण किया, तो एपोच-Extrasolar Planet Observation and Characterization (EPOCh) जिस पर धूमकेतु का परिक्षण करने की जिम्मेदारी थी, उसने हार्टले धूमकेतु की तरफ जाते हुए बीच में किसी तारे के इर्दगिर्द अपनी पृथ्वी की आकार का गृह खोज निकाला!
२०११ में नासाने टेम्पल-१ के लिए दूसरा अवकाश यान भेजा। Stardust New Exploration of Tempel 1 (NExT) मिशन ने इस धूमकेतु के नाभिक मे, सन २००५ में डिप इम्पैक्ट दिए गए रिपोर्ट से अलग बदलाव दिखाए!    

हमारी गैलेक्सी:
Milky Way Galaxy - 8TH GRADE SCIENCE
Fig 8
हमारी आकाश गंगा में हमारे सूरज की तरह १०० ख़रब तारे है, और हमारी गैलेक्सी, जो ऄकार मे अंडाकार है, उसकी कक्षा एक लाख प्रकाश वर्ष जितनी लम्बी है।
इनमे तारों का पुंज चार दिशा में फैला है, मानो चार हाथ हो, बिलकुल पिनव्हील की तरह! और हम इसके केंद्र से दो-तिहाई बाहर की अौर स्थित है।              
हमारी गैलेक्सी में अधिकतम तारे उनके अपने-अपने ग्रहो के साथ देखा गया है। अभी तक ऐसे हजारो सूरज ढूंढे गए है जिनका अपना ग्रहो का कुटुंब है। और कई हजारो तारों को देखा गया है जिनकी पुष्टि अभी तक होनी बाकि है। इनमे से कई नए तारों का पुंज हमारे सौरमंडल से विपरीत है।      
हमारे आकाश गंगा के सभी तारे एक विशालकाय ब्लेक होल की परिक्रमा कर रहे है। यह ब्लेक होल हमारे आकाश गंगा के बिलकुल केंद्र में है और जिसका आकार हमारे सूरज से चालीस लाख गुना बड़ा है! भाग्यवश हमारी पृथ्वी से यह २८,००० प्रकाश-वर्ष दूर है। हमारी आकाश गंगा इस ब्रह्माण्ड में अरबो में से एक है। और इन हर आकाश गंगा में अरबो-खरबो तारे है।
हम हमारी आकाश गंगा को मिल्की-वे कहते है, क्यूंकि जब इसे पहली बार खोजा गया तब यह एक दूध की गंगा जैसे दिख रही थी। मानो ब्रह्माण्ड का कोई सफ़ेद रास्ता हो! 

आकार और अन्तर:
इस आकाशगंगा के सारे तारे, पुंज अवस्था में, आकाशगंगा के केंद्र में जो ब्लेक होल है, उसकी परिक्रमा करते है।
Fig 9
जैसे हमने पढ़ा है की हमारी पृथ्वी से यह ब्लेक होल २८,००० प्रकाश वर्ष दूर है इसलिए हम सुरक्षित है। हमारी आकाश गंगा गांगेय कक्षा में खुद को लपेटे ८,२८,००० किलोमीटर प्रति घंटे गति से परिक्रमा कर रही है। इस गांगेय केंद्र की एक परिक्रमा लगाने के लिए हमारे सौर्यमंडल को करीब अब्ज तिस करोड़ साल लगेंगे।                  
स्थान:
हमारी आकाश गंगा एक स्थानीय समूह का हिस्सा है जिसकी कक्षा १०० लाख प्रकाश वर्ष जितना फैली है और जिसमे ३० से ज्यादा गैलेक्सी का समूह है और यह सारे गुरुत्वाकर्षण से एक दूसरे से बंधे हुए है।
हमारी गैलेक्सी के अलावा सबसे बड़ा समूह एंड्रोमेडा के नाम से जाना जाता है। और उसकी हालचाल दिखा रही है के यह समूह अगले अरब साल में हमारे मिल्की वे से टकरायेगा!
   
संरचना:
वैज्ञानिक के अध्ययन के अनुसार यह परिणाम निकला है के, बाहरी हिस्से के तारे, गांगेय केंद्र की परिक्रमा इतनी तेजी से करते है की उसे देख न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का नियम, लगता है के यहाँ लागु ही नहीं होता। 
सारे तारे, गैस के बादल और धूल, जो इस गैलेक्सी के हिस्से है, इनके अलावा भी कुछ ऐसा है जो इस गैलेक्सी में गुरुत्वाकर्षण पैदा करता है, और वो भी काफी मात्रा में है
यह हिसाब लगाया गया है के यह रहस्यमय काला हिस्सा हमारी समझ के पांच गुना बड़ा है, जिसे पता लगाने के लिए एक ही साधन है और वह है उसमे काम करता गुरुत्वाकर्षण।
स्थानीय समूह की तरह इस गैलेक्सी के समूह में खरबो स्थानीय समूह है और वे सारे एक दूसरे से दूर जा रहे है, जिसकी वजह से उनके बीच खिंचाव के कारण बडा सा अवकाश निर्माण हो रहा है।                                                                                 
इसका मतलब यह है के पूरा ब्रह्माण्ड ही विस्तारित हो रहा है। यह खोज इस बात को प्रमाणित करती है के ब्रह्माण्ड में बडासा धमाका होने वाला है। हो सकता है के ऐसा भूतकाल में भी हुआ हो, जिसकी वजह से हमारा सौरमंडल अस्तित्व में आया।
                                                                         Fig 10
वैज्ञानिको का मानना है के गुरुत्वाकर्षण की ताकद ही इन गैलेक्सी को प्रसारित होने से या फटने से रोक सकती है।  मगर १९९० के दशक में वैज्ञानिको ने खोज निकाला के यह प्रसारण काफी तेजी से हो रहा है। इस तेजी से बढ़ने वाले प्रसारण को काली ऊर्जा माना गया है।                                                               
कोई नहीं जानता वो असल में क्या है, मगर एक बात तय है के यह काली ऊर्जा अंतरिक्ष का एक खालीपन है।

चूँकि पदार्थ और ऊर्जा सम मात्रा में है (न्यूटन के प्रसिद्ध सिद्धांत E=MC2), वैज्ञानिको ने हिसाब लगाया है के जो भी काली ऊर्जा वहा पायी गयी है उसका प्रमाण सारे ब्रह्माण्ड के ६८% है। और जो अतिरिक्त काले घन पदार्थ है उनकी मात्रा ब्रह्माण्ड के २७% है। बाकि के % में प्रोटोन, न्यूट्रॉन, इलेक्ट्रॉन्स और फोटोन्स है, जिन्हे हम देख और समझ सकते है !

वैज्ञानिको का मानना है के ब्रह्माण्ड में जिन गैलेक्सी को हम देख सकते है उनकी संख्या सो खरब जितनी है, और हर गैलेक्सी खरबो तारों से भरी है।
काफी बड़े पैमाने पर इस गैलेक्सी की संरचना बुलबुला जैसी है। जिसमे गैलेक्सी के तंतु और विशाल चादरे, प्रचंड मात्रा मे है और जो एक महाविशाल रिक्त स्थान की परिक्रमा लगा रही है।

Vilas Ekbote
8796212032

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