आदमी का लोक डाउन या धरती का स्वयं इलाज ?
कोविड-19 महामारी के चलते दुनिया का तक़रीबन हर इंसान खुद के घर में कम से कम ५० दिन कैद हो गया है।
जिसके चलते इंसान द्वारा हवा को प्रदूषित करने का सिलसिला थम सा गया है।
विकसित देश एसी, गाड़िया चलाते है, CO2 पैदा करते है और प्रदुषण पर आंतरराष्ट्रीय मीटिंग करते है। विकासशील देश, विकास के साथ Co2 का निर्माण करते है और विकसित देश ने प्रदुषण फैलाया है यह दलील करते है ! पर हमने प्रदुषण निर्माण किया यह कोई नहीं मानता !
मगर इस हवामान के बदलाव का असर गरीब देशोको भूगतना पडता है।
प्रदुषण वातावरण पर सीधा असर करता है।
इंग्लैंड की कार्बन ग्रिड कंपनी के विश्लेषण के अनुसार हवा मे CO2 याने कार्बनडाइऑक्सइड का प्रमाण काफी बड़े पैमाने पर घट गया है ।
चीन में लोकडाउन के चलते यहाँ २५% उत्सर्जन घटा है। आगे दर्जनों देशो मे लोकडाउन लागु करने से हवा मे प्रदुषण का अभ्यास करने के जितने भी मापदंड है वह सभी यही दिखाते है के किस तरह सामानो की यातायात, बिजली की मांग और कारखाने आदि सब बंद हो गए है, रुक गए है, या कम हुए है।
प्रदुषण के उत्सर्जन का वैश्विक आंकलन अधिकांश जीडीपी वृद्धि के कम-ज्यादा होने के पूर्वानुमानों पर आधारित होता हैं।
कुछ लोगो का मानना है के अगर कारख़ानाओं की पुनर्रचना न की जाय तो प्रदुषण, जो इन लोकडाऊन में घटा था, उसकी परिस्थिति उलट सकती है।
कार्बन ब्रिफ सबूते हासिल कर रही है के किस तरह इस महामारी में ऊर्जा का उत्पादन कम हुआ है, जिसके चलते कार्बनडाइऑक्सइड का उत्सर्जन कम हो रहा है।
देश की जीडीपी के अभ्यास के लिए इन बातो का इस्तेमाल होता है ।
दुनिया के कुल उत्सर्जन का तीन चौथाई हिस्सा, जिसमे चीन का सम्पूर्ण उत्पादन, अमेरिका, यूरोप यूनियन का कार्बन मार्किट, भारत का बिजली क्षेत्र, वैश्विक तेल क्षेत्र आदि इस वैश्विक उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है, इन्हे ध्यान में रखकर पांच महत्वपूर्ण डाटासेट और अनुमानों को अंकित किया गया है ।
कार्बन ब्रिफ के इस डाटा के आकलन से यह प्रतीत होता है के ऊपर बताये हुए इलाको में कार्बन का उत्सर्जन २००० मेट्रिक टन कम होगा। लेकिन यह आकड़ा और भी बढ़ेगा क्यूंकि विश्व के बाकि देशों का आकलन इसमें शामिल नहीं है।
१५ अप्रैल २०२० के आंकड़े: तेल की सन २०२० की नयी वैश्विक मांग के पूर्वानुमानक अभ्यास पर यह विश्लेषण किया गया है के इस साल तेल की मांग काफी बड़े पैमाने पर गिर जाएगी ।
इसके पहिले आंकलन कर के अनुमान लगाया गया था के १६०० मेट्रिक टन CO2 का उत्सर्जन होगा, जो पिछले साल याने सन २०१९ के मुकाबले ४% ज्यादा था । और सारे विश्व की बात करे तो ५.५% ज्यादा था।
कोरोना के महामारी की वजह से इस उत्सर्जन का प्रमाण पिछले सारे आर्थिक संकट काल या युद्ध काल के मुकाबले काफी घट गया है।
मगर इससे जागतिक तापमान मात्र १.५ सेल्सियस डिग्री जितना ही घट गया है। जब के इस दशक के हर साल उत्सर्जन में गिरावट ७.६% जितनी होनी चाहिए थी। ताकि सन २०२० में यह प्रमाण २८०० मेट्रिक टन CO2 हो सकता था, जिसके चलते जागतिक तापमान १.५ सेल्सियस डिग्री से कम हो सकता है।
दूसरे शब्दों में कहा जाय तो इस साल हवामान में कार्बन की मात्रा ज्यादा रहने वाली है, फिर भले ही कोविद-१९ के चलते उत्सर्जन में गिरावट हो।
CO2 के उत्सर्जन के साथ ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ रहा है। इसमें तभी फर्क पड़ेगा जब साल भर में उत्सर्जन शून्य पर आ जाये ।
३० अप्रैल २०२०: इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आगाही के मुताबिक महामारी के चलते उत्सर्जन में ८% गिरावट आएगी। जो २६०० Mt CO2 होगा। कार्बन ब्रिफ के आकड़े विश्व के वातावरण के ७५% थे तो एजेंसी के आकड़े १००% थे ।
मटमैले रंग की पट्टिया दिखाती है के २०१९ साल के मुकाबले अगर २%, ४% या ६% गिरावट होती है तो कितने टन का उत्सर्जन काम होगा। लाल पट्टिया दर्शाती है के कोरोना वायरस के चलते, चीन का सम्पूर्ण उत्पादन, अमेरिका, यूरोप यूनियन का कार्बन मार्किट, भारत का बिजली क्षेत्र, वैश्विक तेल क्षेत्र आदि में होने वाले उत्सर्जन पर कितना प्रभाव पड़ सकता है।
जहा तक हो सके यह ग्राफ महामारी के पहले के आकड़े दर्शा रहा है।
विश्लेषण की दिक्कते:
उत्सर्जन के आकड़े काफी चुनैतीपूर्ण होते है।
जागतिक स्तर पर कोरोना वायरस के चलते लोकडाउन के असर से उत्सर्जन की मात्रा का विश्लेषण करने में कार्बन ब्रीफ की चुनौतियों के बारे में ध्यान देना चाहिए।
समय पर जानकारी हासिल करना, कोरोना वायरस के पैटर्न में होते हुए बदलाव, जिसकी वजह से इस महामारी का फैलाव और कितने काल के लिए यह महामारी रहने वाली है इन सारे अनिश्चित मुद्दों के कारण कार्बन ब्रीफ को १००% विश्लेषण करने में दिक्कते आती है।
यूनाइटेड किंगडम में पेट्रोलियम उत्पादों की मांग का ब्यौरा हर महीने छपता है, मगर कोरोना के चलते जनवरी २०२० का ब्यौरा, मार्च २०२० के अंत में आया।
साथ ही ग्रेट ब्रिटेन ने जो २० मार्च को टेक्स के आकड़े प्रकाशित किये थे, जिसमे ईंधन ड्यूटी आय भी शामिल थी और रस्ते की यातायात का ब्यौरा भी शामिल था।और वह भी फरवरी तक!
संक्षिप्त में कहे तो यह आकड़े पूरी तरह से सही या विश्वसनीय नहीं हो सकते।
आम तौर पर ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट सालाना CO2 के उत्सर्जन के आकड़े ले लिए उस साल के नवम्बर या दिसम्बर से अपना काम सुरु करते है। मगर परिपूर्ण आकड़े आने में वसंत ऋतु आ जाती है। और पक्की डाटा मिलने में काफी समय लगता है।
US Energy Information Administration (US EIA) राष्ट्रिय ऊर्जा का ब्यौरा और उत्सर्जन के अंदाजन आकड़े कुछ ही हफ्तो मे जाहिर करते है।लेकिन उनमे कुछ खामिया भी होती है। फिर भी ८ अप्रैल को उसके वैश्विक तेल बाजार पर साप्ताहिक रिपोर्ट में कहा के वैश्विक आकड़े वास्तव में सीमित रहते है।
ऊर्जा के इस्तेमाल से होने वाले उत्सर्जन पर इस महामारी का कितना असर पड़ेगा यह जानने के लिए, कार्बन ब्रीफ कई प्रकार के स्त्रोत का अध्ययन करते है।
इसमें प्रत्यक्ष डाटा, अप्रत्यक्ष निर्देशांक, अखबारी खबरे और दूसरो ने किये हुए पूर्वानुमान शामिल भी है। सड़क परिवहन की मांग, हवाई यात्रा, औद्योगिक गतिविधिया, आर्थिक उत्पादन, बिजली की मांग, हवा में प्रदुषण, हवामान में कार्बन की मौजूदगी का प्रमाण और अन्य विश्वसनीय डाटा इन सभी बातों पर इस अध्ययन में विचार होता है।
कुछ देशो में और इलाको में अंतर्देशीय हवाई यातायात पर मौजदा महामारी की ऐसी मार पड़ी है के ऐसा लगता है के उत्सर्जन के लिए दूसरे घटक उतना योगदान नहीं देते जितना उड्डयन क्षेत्र।
अगर उत्सर्जन के सही सही आकड़े चाहिए तो हमें साल के ख़त्म होने तक इंतजार करना पड़ेगा । क्यूंकि कब कौनसा देश लोकडाउन खोलता है, कौन सा देश लोकडाउन का सही पालन नहीं करता यह बाते भी ऊपर दिए हुए वजहों के अलावा उत्सर्जन का सही आकड़ा दे सकता है।
वि वा




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