पिछले भाग में हमने जैविक खेती का स्वरुप देखा।
अगर खेत जमीन जैविक खेती के लायक न हो, याने उसपर काफी समय से केमिकल का उपयोग हो रहा हो तो क्या करना चाहिए?
आइये जानते है :
रूपांतरण
रूपांतरण की कालावधि की योजना : यदि किसान पारंपरिक खेती कर रहा हैं और खेत पूरी तरह से जैविक नहीं है तो किसान के पास रूपांतरण योजना होनी चाहिए।
कार्बनिक संचालन और सर्टिफिकेशन की शुरुआत के बीच जो समय लगता है उसे 'रूपांतरण' काल कहते है। जमीन किस प्रकार की है और उसपर अब तक उगाये गए पिक का इतिहास क्या है इन बातो को ध्यान में रखते हुए रूपांतरण का सटीक समय काल तय किया जाता है।
यदि खेत आंशिक रूप से जैविक हो तो रूपांतरण अवधि भी उसके आधार पर लागू होती है । हालाँकि जैविक और अकार्बनिक क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से चिह्नित किया जाना चाहिए और अलग-अलग रखा जाना चाहिए।
धीरे-धीरे, समय के साथ-साथ पशुधन सहित पूरे खेत को जैविक में परिवर्तित किया जाना चाहिए। औसतन, रूपांतरण की वार्षिक अवधि तीन साल के लिए है।
मिश्रित खेती :
यह कृषि खेती का एक अभ्यास है, जिसमें न केवल फसलों की खेती होती है, बल्कि अन्य खेती जैसे पशुपालन, सेरीकल्चर- याने रेशम के कीड़ों का पालन, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि शामिल हैं। दूसरे शब्दों में, मिश्रित खेती, मिटटी की उर्वरता और फसल की उपज सुनिश्चित करने के लिए कृषि प्रणाली में जानवरों का समाकलन जरुरी है।
फसल का पैटर्न:
चूँकि मिट्टी जैविक खेती का आवश्यक घटक है, इसलिए फसल का प्रभावी चक्रिकरण और पैटर्न का अभ्यास मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
खेत में एक ही फसल को बार-बार उगाने से बचना चाहिए क्योंकि इससे मिट्टी की उर्वरता पर बुरा असर होता है। इंटरक्रॉपिंग याने अंतर-फसल से मिटटी का पोषक मूल्य बनाये रखने में मदद मिलती है। कुछ लोग हल्दी, अदरक, शकरकंद आदि की खेती करते हैं। आम को कई बार Elephant Foot Yam (एक उष्णकटिबंधीय कंद), शकरकंद और कसावा के साथ मिलाया जाता है। गोभी, मूली, ककड़ी जैसी सब्जियां मकई के साथ बरी बरी उगाये जाते हैं। काली मिर्च और प्याज अक्सर एक साथ उगाए जाते हैं। इन उपायों से मिट्टी का पोषक मूल्य नष्ट नहीं होता। इसके अलावा, अंतर-फसल तरीके से रोग और कीटनाशकों के प्रबंधन में प्रभावी रूप से मदद करती है।
जैविक खेती में रोपण:
जिस क्षेत्र में किसान खेती करना चाहते है उस क्षेत्र का मौसम, वहा की वातावरण और मिट्टी का कौनसा प्रकार है उसके अनुसार खेती करनी चाहिए। कई बार किसान इस बात को भूल जाता है। उसे हमेशा याद रखना होगा की मिटटी का स्वरुप कैसा है और उसके अनुसार ही खेत उत्पाद का चयन करना चाहिए ।
रोपण सामग्री और बीज एक विश्वसनीय स्रोत से खरीदे जाने चाहिए जो सरकारी द्वारा रजिस्टर्ड संस्था से जैविक प्रमाणित हो।
यदि जैविक ’उपलब्ध नहीं हैं, तो रासायनिक रूप से अनुपचारित रोपण सामग्री का उपयोग किया जाना चाहिए।
पराग कल्चर के बीज, टिशू कल्चर के बीज, ट्रांसजेनिक पौधे, आनुवंशिक रूप से इंजीनियर बीज भी इस्तेमाल नहीं किये जाने चाहिए।
खाद आवश्यकताएँ :
फलीदार फसलों, हरी खाद की फसलों, आदि के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखा जाना चाहिए। Bio-degradable सामग्री खाद के रूप में उपयोग किया जाता है। ये सामग्री पशु या पौधे की उत्पत्ति की होनी चाहिए। फसल और पशु अवशेषों को सीधे या परोक्ष रूप से मिट्टी में पुनर्नवीनीकरण किया जाना चाहिए। वर्मीकम्पोस्ट, भेड़ की कलम, खेतों की खाद, आदि जैसी खादों की अनुमति है मगर रासायनिक उर्वरक के लिए अनुपाती नहीं हैं। यदि मिट्टी में कार्बनिक क्षेत्रों के लिए खनिज आधारित खाद की आवश्यकता होती है, तो खाद बनाने के लिए जिन उत्पादों का उपयोग किया जा सकता है, उनकी यदि इस तरह है :
१. मुल्चे, स्लरी फार्म यार्ड खाद,(घोल का खेत) खेत में पैदा होती फसल के अवशेष;
२. चाक, जिप्सम, कैल्शियम क्लोराइड;
३. अनुपचारित लकड़ी से लकड़ी की छीलन और चूरा;
४. सोडियम क्लोराइड;
५. जीवाणु आधारित जैव उर्वरक, जैसे राइजोबियम, एजोस्पिरिलम आदि;
६. मैग्नीशियम की चट्टानें;
७. कृमि खाद;
८. पौधों के अर्क और पौधे आधारित तैयारी, जैसे नीम केक;
९. बायोडायनामिक तैयारी।
२. चाक, जिप्सम, कैल्शियम क्लोराइड;
३. अनुपचारित लकड़ी से लकड़ी की छीलन और चूरा;
४. सोडियम क्लोराइड;
५. जीवाणु आधारित जैव उर्वरक, जैसे राइजोबियम, एजोस्पिरिलम आदि;
६. मैग्नीशियम की चट्टानें;
७. कृमि खाद;
८. पौधों के अर्क और पौधे आधारित तैयारी, जैसे नीम केक;
९. बायोडायनामिक तैयारी।
उपरोक्त उत्पादों का उपयोग केवल तभी किया जाता है जब बिल्कुल आवश्यक हो
पोषण संबंधी असंतुलन, संदूषण, प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए अन्य खेतों से मूत्र, पुआल, घोल आदि का उपयोग करने से पहले प्रमाणित एजेंसी से संपर्क करना भी उचित है।
इसे दूर करने का सबसे अच्छा तरीका एक छोटे पैमाने पर डेयरी फार्म शुरू करना है जो जैविक इनपुट की लागत को कम करेगा और समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।
ऑर्गेनिक का होना याने सिंथेटिक फफूंदनाशकों का उपयोग करना होता है। और इसमें जंगली घास को नष्ट करने वाली कीटनाशक का इस्तेमाल करना मना है।
कीटनाशकों के प्राकृतिक दुश्मन को बढ़ाया जाता है और उन्हें संरक्षित भी किया जाता हैं। उदाहरण के लिए, खेत में एक पेड़ लगाने या पक्षियों के घोंसले का निर्माण पक्षियों की संख्या बढ़ायी जाती है, क्यूंकि पंखी किटको पर निर्भर करते है जिससे खेत पर किटकों के मंडराने का खतरा कम हो।
जंगली घास के लिए, हाथोसे निराई की प्रक्रिया की जाती है। जंगली घास जो पौधों के करीब उगी है उसे निकालकर पुरे खेत में गीली घास के रूप में बोये जाते है। पौधे आधारित रिपेलेंट्स, नीम के बीज की गिरी का अर्क, यांत्रिक जाल, फेरोमोन जाल, मिट्टी, नरम साबुन और रंगीन जाल आदि का खेत में इस्तेमाल करना अनुमति है।
पूर्ण आवश्यकता के मामले में प्रमाणित करने वाली एजेंसी से सलाह मशवरा करना चाहिए और निम्नलिखित उत्पादों का उपयोग किया जाना चाहिए:
१. खनिज तेल जैसे के मिटटी का तेल ;
२. पौधे और जानवरों की तैयारी ;
३. बोर्डियक्स मिश्रण।
फसल के किटको में कुछ प्राकृतिक शत्रु होते हैं, जैसे मिक्रोमस, कोकीननेलिड्स, सिरफिडाय, मकड़ियों और कैंपोल्टिस ।
कोकीनेलिड्स आलू, मक्का, कपास, मूंगफली और सोयाबीन आदि पौधों से लीफहॉपर्स और मकड़ियों को कम करते हैं।
भारत में जैविक खेती कितनी लाभदायक है ?
अगर जैविक खेती के लिए सही प्रकार माँ बाजार मिले तो जैविक खेती से मुनाफा बनाया जा सकता है।
फायदे के दो प्रमुख प्रकार है।
१. खेत में पशु और पौधों के अवशेष का निविष्ट करने से खर्चा काम होगा ;
२. परंपरागत रूप से उगाए गए कृषि उत्पादों की तुलना में जैविक उत्पाद का बाजार मूल्य और मांग अधिक है।
जैविक उत्पादकों की विदेशी मांग भी काफी है। मगर इस प्रकार की खेती के नियमोंका कड़ी से पालन होना चाहिए। और साथ ही सम्बंधित पंजीकृत संस्था से प्रमाणीकरण होना भी जरुरी है।
भारत में जैविक खेती के साथ संपन्न होने के लिए एक सुरक्षित उद्यम है, हालांकि इसे स्थापित करने और पूरी तरह से कार्य करने में थोड़ा समय लग सकता है। व्यावसायिक पहलुओं के लिए सरकारी सब्सिडी उपलब्ध है ।
निष्कर्ष :
यदि जैविक खेती के तरीकों का सख्ती से पालन किया जा सकता है, तो आवश्यक जैविक प्रमाणीकरण पाया जा सकता है और सही बाजार तक पहुंचाया जाय तो भारत में जैविक खेती बहुत लाभदायक है।
V वा
८७९६२१२०३२


