Thursday, May 28, 2020

जैविक खेती - भाग २


पिछले भाग में हमने जैविक खेती का स्वरुप देखा।

अगर खेत जमीन जैविक खेती के लायक न हो, याने उसपर काफी समय से केमिकल का उपयोग हो रहा हो तो क्या करना चाहिए?
आइये जानते है :
रूपांतरण

रूपांतरण की कालावधि की योजना : यदि किसान पारंपरिक खेती कर रहा हैं और खेत पूरी तरह से जैविक नहीं है तो किसान के पास रूपांतरण योजना होनी चाहिए। 

कार्बनिक संचालन और सर्टिफिकेशन की शुरुआत के बीच जो समय लगता है उसे 'रूपांतरण' काल कहते है। जमीन किस प्रकार की है और उसपर अब तक उगाये गए पिक का इतिहास क्या है इन बातो को ध्यान में रखते हुए रूपांतरण का सटीक समय काल तय किया जाता है।
  
यदि खेत आंशिक रूप से जैविक हो तो रूपांतरण अवधि भी उसके आधार पर लागू होती है । हालाँकि जैविक और अकार्बनिक क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से चिह्नित किया जाना चाहिए और अलग-अलग रखा जाना चाहिए।

धीरे-धीरे, समय के साथ-साथ पशुधन सहित पूरे खेत को जैविक में परिवर्तित किया जाना चाहिए। औसतन, रूपांतरण की वार्षिक अवधि तीन साल के लिए है।

मिश्रित खेती :

यह कृषि खेती का एक अभ्यास है, जिसमें न केवल फसलों की खेती होती है, बल्कि अन्य खेती जैसे पशुपालन, सेरीकल्चर- याने रेशम के कीड़ों का पालन, मछली पालन, मुर्गी पालन आदि शामिल हैं। दूसरे शब्दों में, मिश्रित खेती, मिटटी की उर्वरता और फसल की उपज सुनिश्चित करने के लिए कृषि प्रणाली में जानवरों का समाकलन जरुरी है।

फसल का पैटर्न:

चूँकि मिट्टी जैविक खेती का आवश्यक घटक है, इसलिए फसल का प्रभावी चक्रिकरण और पैटर्न का अभ्यास मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने  के लिए आवश्यक है।
खेत में एक ही फसल को बार-बार उगाने से बचना चाहिए क्योंकि इससे मिट्टी की उर्वरता पर बुरा असर होता है। इंटरक्रॉपिंग याने अंतर-फसल से मिटटी का पोषक मूल्य बनाये रखने में मदद मिलती है। कुछ लोग हल्दी, अदरक, शकरकंद आदि की खेती करते हैं। आम को कई बार Elephant Foot Yam (एक उष्णकटिबंधीय कंद), शकरकंद और कसावा के साथ मिलाया जाता है। गोभी, मूली, ककड़ी जैसी सब्जियां मकई के साथ बरी बरी उगाये जाते हैं। काली मिर्च और प्याज अक्सर एक साथ उगाए जाते हैं। इन उपायों से मिट्टी का पोषक मूल्य नष्ट नहीं होता। इसके अलावा, अंतर-फसल तरीके से रोग और कीटनाशकों के प्रबंधन में प्रभावी रूप से मदद करती है।

जैविक खेती में रोपण: 

जिस क्षेत्र में किसान खेती करना चाहते है उस क्षेत्र का मौसम, वहा की वातावरण और मिट्टी का कौनसा प्रकार है उसके अनुसार खेती करनी चाहिए। कई बार किसान इस बात को भूल जाता है। उसे हमेशा याद रखना होगा की मिटटी का स्वरुप कैसा है और उसके अनुसार ही खेत उत्पाद का चयन करना चाहिए ।  

रोपण सामग्री और बीज एक विश्वसनीय स्रोत से खरीदे जाने चाहिए जो सरकारी द्वारा रजिस्टर्ड संस्था से जैविक प्रमाणित हो। 
यदि जैविक ’उपलब्ध नहीं हैं, तो रासायनिक रूप से अनुपचारित रोपण सामग्री का उपयोग किया जाना चाहिए। 

पराग कल्चर के बीज, टिशू कल्चर के बीज, ट्रांसजेनिक पौधे, आनुवंशिक रूप से इंजीनियर बीज भी इस्तेमाल नहीं किये जाने चाहिए।

खाद आवश्यकताएँ :

फलीदार फसलों, हरी खाद की फसलों, आदि के उपयोग से मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखा जाना चाहिए। Bio-degradable सामग्री खाद के रूप में उपयोग किया जाता है।  ये सामग्री पशु या पौधे की उत्पत्ति की होनी चाहिए। फसल और पशु अवशेषों को सीधे या परोक्ष रूप से मिट्टी में पुनर्नवीनीकरण किया जाना चाहिए। वर्मीकम्पोस्ट, भेड़ की कलम, खेतों की खाद, आदि जैसी खादों की अनुमति है मगर रासायनिक उर्वरक के लिए अनुपाती नहीं हैं। यदि मिट्टी में कार्बनिक क्षेत्रों के लिए खनिज आधारित खाद की आवश्यकता होती है, तो खाद बनाने के लिए जिन उत्पादों का उपयोग किया जा सकता है, उनकी यदि इस तरह है :

१. मुल्चे, स्लरी फार्म यार्ड खाद,(घोल का खेत) खेत में पैदा होती फसल के अवशेष;

२. चाक, जिप्सम, कैल्शियम क्लोराइड;

३. अनुपचारित लकड़ी से लकड़ी की छीलन और चूरा;

४. सोडियम क्लोराइड;

५. जीवाणु आधारित जैव उर्वरक, जैसे राइजोबियम, एजोस्पिरिलम आदि;

६. मैग्नीशियम की चट्टानें; 

७. कृमि खाद;

८. पौधों के अर्क और पौधे आधारित तैयारी, जैसे नीम केक;

९. बायोडायनामिक तैयारी

उपरोक्त उत्पादों का उपयोग केवल तभी किया जाता है जब बिल्कुल आवश्यक हो

पोषण संबंधी असंतुलन, संदूषण, प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए अन्य खेतों से मूत्र, पुआल, घोल आदि का उपयोग करने से पहले प्रमाणित एजेंसी से संपर्क करना भी उचित है।

इसे दूर करने का सबसे अच्छा तरीका एक छोटे पैमाने पर डेयरी फार्म शुरू करना है जो जैविक इनपुट की लागत को कम करेगा और समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।

ऑर्गेनिक का होना याने सिंथेटिक फफूंदनाशकों का उपयोग करना होता है। और इसमें जंगली घास को नष्ट करने वाली कीटनाशक का इस्तेमाल करना मना है। 
कीटनाशकों के प्राकृतिक दुश्मन को बढ़ाया जाता है और उन्हें संरक्षित भी किया जाता हैं। उदाहरण के लिए, खेत में एक पेड़ लगाने या पक्षियों के घोंसले का निर्माण पक्षियों की संख्या बढ़ायी जाती है, क्यूंकि पंखी किटको पर निर्भर करते है जिससे खेत पर किटकों के मंडराने का खतरा कम हो।  
जंगली घास के लिए, हाथोसे निराई की प्रक्रिया की जाती है। जंगली घास जो पौधों के करीब उगी है उसे निकालकर पुरे खेत में गीली घास के रूप में बोये जाते है।   पौधे आधारित रिपेलेंट्स, नीम के बीज की गिरी का अर्क, यांत्रिक जाल, फेरोमोन जाल, मिट्टी, नरम साबुन और रंगीन जाल आदि का खेत में इस्तेमाल करना अनुमति है। 

पूर्ण आवश्यकता के मामले में प्रमाणित करने वाली एजेंसी से सलाह मशवरा करना चाहिए और निम्नलिखित उत्पादों का उपयोग किया जाना चाहिए: 

१. खनिज तेल जैसे के मिटटी का तेल ;

२. पौधे और जानवरों की तैयारी ;

३. बोर्डियक्स मिश्रण। 

फसल के किटको में कुछ प्राकृतिक शत्रु होते हैं, जैसे मिक्रोमस, कोकीननेलिड्स, सिरफिडाय, मकड़ियों और कैंपोल्टिस । 
कोकीनेलिड्स आलू, मक्का, कपास, मूंगफली और सोयाबीन आदि पौधों से लीफहॉपर्स और मकड़ियों को कम करते हैं।

भारत में जैविक खेती कितनी लाभदायक है ?   

अगर जैविक खेती के लिए सही प्रकार माँ बाजार मिले तो जैविक खेती से मुनाफा बनाया जा सकता है। 
फायदे के दो प्रमुख प्रकार है। 

१. खेत में पशु और पौधों के अवशेष का निविष्ट करने से खर्चा काम होगा ;  

२. परंपरागत रूप से उगाए गए कृषि उत्पादों की तुलना में जैविक उत्पाद का बाजार मूल्य और मांग अधिक है।

जैविक उत्पादकों की विदेशी मांग भी काफी है। मगर इस प्रकार की खेती के नियमोंका कड़ी से पालन होना चाहिए। और साथ ही सम्बंधित पंजीकृत संस्था से प्रमाणीकरण होना भी जरुरी है। 

भारत में जैविक खेती के साथ संपन्न होने के लिए एक सुरक्षित उद्यम है, हालांकि इसे स्थापित करने और पूरी तरह से कार्य करने में थोड़ा समय लग सकता है। व्यावसायिक पहलुओं के लिए सरकारी सब्सिडी उपलब्ध है ।  

निष्कर्ष :

यदि जैविक खेती के तरीकों का सख्ती से पालन किया जा सकता है, तो आवश्यक जैविक प्रमाणीकरण पाया जा सकता है और सही बाजार तक पहुंचाया जाय तो भारत में जैविक खेती बहुत लाभदायक है।


V वा
८७९६२१२०३२

Wednesday, May 27, 2020

जैविक खेती - भाग १



जैविक खेती

मारे देशमे एक बहुत बड़ी विटंबना है। जो किसान खेतोंमें अनाज पैदा करता है, वही सबसे ज्यादा भूका रहता है। यह हमारे सिस्टम की नाकामी का बड़ा नमूना है। 

हमारे देश में जैविक खेती का संकल्पना नयी नहीं है।  आपको जानकर हैरानी होगी के हमारे प्राचीन काल में भी इसका प्रयोग हो रहा था !

लेकिन जनसंख्या विस्फोट की वजह से बढती हुई मांग के चलते रासायनीक खेती का आरंभ हुआ, क्यूंकि कम समय में ज्यादा उपज मिलती थी, मगर यह खेत जमीन और इंसान की सेहत लिए हानिकारक होने लगी। 

इसका मूल उद्देश्य यही था के जैविक कचरा और जैव उर्वरक, जो मिटटी में घुलकर खाद का काम करते है, उससे खेत की जमीन उपजाऊ होती है। जैविक खाद से सिर्फ खेत उत्पाद बढ़ता है साथ ही प्रदुषण मुक्त वातावरण भी बन जाता है। विदेशोंमें इसे ग्रीन फार्मिंग कहा जाता है।

जैविक खेती में कीटनाशक, उर्वरक, हार्मोन आदि हानिकारक घटको का इस्तेमाल नहीं होता।   

जैविक खेती में फसल की उत्पाद बदली जाती है ,जैविक अपशिष्ट याने जैविक कचरा, खेत की खाद, चट्टान की एडिटिव याने वो तत्त्व जो चट्टान के घटक को कृत्रिम तरीकेसे बढ़ाते है, और फसल के अवशेष याने सुखी डालिया, पत्ते आदि पोषक तत्वोका इस्तेमाल किया जाता है और पौधोंको सुरक्षित किया जाता है

दूसरे शब्दों में कहे तो जैविक खेती में कुदरती तत्वोका इस्तेमाल करके उत्पाद लिया जाता है। जिससे हम सिर्फ खेत जमीं को उपजाऊ बनाते है, लेकिन हमें स्वस्थ और ऊँची जात की फसल भी मिलती है। ताकि कृषि उत्पाद को इतना बढ़ाया जाये के यह व्यवहारिक हो।
  
हमें जैविक खेती की क्यों जरुरत पड़ी?


देश में हरित क्रांति जो डॉ. एम् एस स्वामीनाथन जी लाये थे, उसके फायदे अब एक ऊंचाई तक पहुंचे थे और अब उसके फ़ायदों का ग्राफ निचे निचे आता रहा था। इसीलिए कोई वैकल्पिक तकनीक की जरुरत हुई थी। 

इसके अलावा इस हरित क्रांति में जरुरत से ज्यादा इस्तेमाल होती हुई रासायनिक उर्वरको (FERTILIZERS) कारण और खेत उत्पाद को अनैसर्गिक तरीके से बढ़ने के तरीके से एक ऐसी परिस्थिति निर्माण होते गयी जिसे हम प्रदुषण कह सकते है। इन रासायनिक उर्वरको के कारण सिर्फ लोगो के सेहत पर बुरा असर होने लगा, साथ ही खेत की जमीन और हवा में भी यह रासायनिक तत्त्व नुकसान पहुंचाने लगे।

इंसानी जीवन और प्रकृति संसाधन में संतुलन जमा रहे इसीलिए इस दिशा में प्रयास सुरु हुए।

जीवाश्म ईंधन याने फॉसिल फ्युएल के नष्ट होने की स्थिति और इसके पुनरूज्जीवन होने की क्षमता होने के कारण खेती के नए तरीके खोजे गए, जो हमारे कुदरत के लिए भी फायदेमंद हो।

क्या है जैविक खेती की संकल्पना ?

जैविक खेती एक मूल संकल्पना है। इनके निम्नलिखित सिद्धांत है। 

. मिटटी एक अपने आप में जीवन है।

. प्रकृति अपने आप में खेती सीखने वाली संस्था है, जिसे किसी भी बाहरी तत्वोकी, यहाँ तक के उसे अतिरिक्त पानी की भी जरुरत नहीं है।  

. प्रकृति के तरीकोंपर जैविक खेती निर्भर है। जैविक खेती से पौष्टिक तत्वोंको मिट्टीसे अलग नहीं किया जाता है और ही मिटटी के गुणवत्ता स्तर को, बढ़ती हुई इंसानी जरुरत के लिए घटाया जाता है।

. मिटटी के जिव और पोषण तत्त्व कायम रहते है। मिट्टीके प्राकृतिक सूक्ष्म जीव भी सुरक्षित रहते है।   

. मिटटी ही जैविक खेती का आधार है। मिटटी का स्वास्थ और उसके घटक इस जैविक खेती का हिस्सा है।                                                                                                                                                                     
इस प्रकार जैविक खेती, खेती की एक ऐसी प्रणाली है जिसका उद्देश्य मिट्टी को जीवित रखना है ,उसका स्वास्थ भी कायम तंदुरुस्त रखना है खेती करना और फसल उगाना उसका ध्येय है साथ ही प्रदुषण हो और प्राकृतिक तत्वोंको सुरक्षित रखे यह भी इसका ध्येय है।

जैविक खेती की प्रमुख  विशेषताएं :

. मिट्टी की उर्वरता की रक्षा करना।
. कार्बनिक पदार्थों के स्तर को बनाए रखना।
. मिटटी में जैविक गतिविधि को प्रोत्साहित करना।
. सूक्ष्मजीव की गतिविधि के माध्यम से पोषक तत्व प्रदान करना।
. मिट्टी की नाइट्रोजन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बिजो का उपयोग करना।   
. कार्बनिक पदार्थोंका जैविक तथा खाद की तरह पुनर्चक्रण किया जाय।
. प्राकृतिक शिकारियों, जैविक खाद, फसल का बारी-बारी उगाना, विविधता को बनाए रखना, प्रतिरोधी किस्में बढ़ाना आदि तरीको से खेत जमीं में किटक, जंगली घास और किसी भी बीमारियों को काबू रखना।
. पशुधन के प्रबंध के लिए उनकी पोषक आवश्यकताओं, रहने की व्यवस्था, प्रजनन, पालन पर विशेष ध्यान देना।

भारत में जैविक खेती को अधिकतम बढ़ावा दिया जा रहा है।

इनका तीन स्तरोमे वर्गीकरण किया जाता है।

श्रेणी . : किसानोंके उन क्षेत्र में जहा उपज कम या नहीं के बराबर है उनके लिए जैविक खेती जीवन का एक तरीका है। यह उनके द्वारा युगों से चली रही है और कृषि करने का एक पारंपरिक तरीका है। 

श्रेणी . : पारम्परिक कृषि पद्धतियों के दुष्प्रभाव और उर्वरकों या रासायनिक खाद के दुरुपयोग के कारण, हाल ही में जैविक खेती अपनाने वाले किसान इस श्रेणी में आते हैं।

श्रेणी . : व्यावसायिक दृष्टी से बाजार पर अपना नियंत्रण रखने के लिए जिन किसानो ने जैविक कृषि अपनाई है वे इस तीसरी श्रेणी में आते है। 

अधिकांश किसान पहली श्रेणी में आते हैं, लेकिन वे प्रमाणित किसान या सर्टिफाइड किसान नहीं होते हैं। प्रमाणित किसान याने वो किसान जो अपनी उपज बाजार में बिना किसिस अवरोध के, बेचने के लिए प्रमाणित हो। याने इस पहली श्रेणी में आने वाले किसान वो होते है जो यातो अपनी खुद की गरज के लिए उत्पाद करता है या वो प्रमाणित बाजार के अलावा कही और या किसी और को अपना उत्पाद बेचते है।
प्रमाणित किसान तीसरी श्रेणी में हैं जबकि प्रमाणित और गैर-प्रमाणित किसान दोनों को दूसरी श्रेणी में शामिल किया गया है। 

हमारे देश में फ़िलहाल जो समस्या है वो इस तरह है :

. मिटटी की रोगाणु की शक्ति ख़त्म होती जा रही है और साथ ही कार्बनिक पदार्थ काम होते जा रहे है इसलिए मिटटी का स्वास्थ मरने की कगार पर है।

. जागतिक स्टार पर पृथ्वी का बढ़ता तापमान।

. भूस्तर में काम होते जा रहे पानी का स्तर

. खेती के लिए बढ़ते खर्चे के मुकाबले काम होते जाती उत्पादन की आय।

इन मुद्दोंपर हमें इन बातो पर ध्यान देना है। उत्पादक, टिकाऊ और लागत प्रभावी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए।

. बारिश के पानी का जतन :

बारिश के पानी का जतन इस विषय पर विचार करते हुए जैविक खेती में एक महत्वपूर्ण कदम है कि सिंचाई का एकमात्र स्रोत मौसमी बारिश, स्थानीय तालाब, झीलें और कुएँ हैं। इसलिए, टैंकोलेशन टैंक, खेत तालाबों को खोदा जाना चाहिए। साथ ही खेती कोंटर तरीकेसे की जाय।

. मिटटी का संवर्धन :

चुकी मिटटी में जीवन है, उसे हमेशा समृद्ध रखना चाहिए। जिसके लिए फसल के अवशेष, पशु की विष्टा और जितना भी जैविक कचरा उपलब्ध हो, सभी कुछ मिट्टीमे फिर मिलाना चाहिये।  यही पुनर्चक्र है। हर वो पोषक चीजे जो मिटटी से मिली है उसे फिरसे मिटटी में मिलाना जरुरी है।

जैव उर्वरकों, खाद, जैव पोषक तत्वों आदि का उपयोग करना चाहिए।   

. तापमान बनाये रखना :

ग्रीन हाउस के चलते जागतिक वातावरण का तापमान बढ़ते जा रहा है, इसीलिए खेतो के बांध पर या अगल-बगल पर पेड़ लगाने चाहिए, या खेत को ढकना चाहिए।

. सौर ऊर्जा का अधिकतम उपयोग  :

बायो गैस, सौर ऊर्जा जैसे गैर-पारम्परिक ऊर्जा का खेतो के लिए अधिकतम उपयोग  करना चाहिए।  रोटेशन तरीके से याने फसल को बदलते रखना चाहिए।
किटक नाशक या सिंथेटिक खाद से मिटटी की प्राकृतिक शक्ति को बचाना चाहिए।
पशु, मुर्गिया आदि के विष्टा से मिटटी की सेहत बानी रहती है इसलिए मवेशी तथा मुर्गियों की खेत के लिए बेहद जरुरत है।

. अन्य तकनीक : 

कुछ विशिष्ट प्रकार के केचुए, खुद को विकसित करने वाले बीज, वनस्पति अर्क और तरल खादों का उपयोग आदि अन्य तकनीकी है जिसका खेत उत्पाद को बढ़ने में मदत मिलती है।   
















V वा
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