द्वारका या द्वारावती, भारत के पवित्र शहरों में से एक है। इस नगर को कई द्वार से घेरा गया था इसीलिए इसका नाम द्वारका पड़ा ऐसा माना जाता है।
पर आज हम बात करेंगे उस द्वारका की जो बड़ी ही रहस्यमय तरीके से समुन्दर में डूब गया था। ऐसा माना जाता है कि यह शहर छह बार समुन्दर के पानी में डूब गया था । द्वारका की जब भी बात होती है तो भगवान श्री कृष्ण जी ने बसाई हुई दक्षिणी गुजरात स्थित उस नगरी का ख्याल आता है जो समुद्र में पूरी तरह से समाधी ले चुकी है।
यह एक रहस्यमय तरीके से समुन्दर में समाधी लेने वाला शहर है।
समुन्दर में डूबे हुए इस शहर की जब खुदाई हुई तो इनमे कई बस्तिया, एक बड़े पत्थर से निर्मित घाट, और तीन छेद वाले त्रिकोणीय पत्थर के लंगर के साथ इंसानी बस्ती की कई चीजे मिली।
समुद्री पुरातत्व अन्वेषणसमुद्री पुरातत्व अन्वेषण द्वारा की गयी जाँच में पायी गयी कई कलाकृति के अवशेष इस बात की पुष्टि करती है की यह एक बड़े पैमाने पर संगठित बंदरगाह था।

लेकिन यही डूबा हुआ द्वारका नगर, जिसे माना जाता है की भगवान श्री कृष्ण जी ने बसाया था वाकई में महाभारत और भगवान कृष्ण की ऐतिहासिक प्रासंगिकता के सत्यापन से जुड़ा है ? इसे साबित करना एक बड़ी चुनौती है।
हाल ही में यह वैज्ञानिक तरीकों और पुरातत्व के माध्यम से पौराणिक कथाओं को साबित करने के लिए यह एक कथा बन गई है।
यु तो आपको सेकड़ो वीडियो तथा लेख मिलेंगे जो यह साबित करने की कोशिश करते है की यह शहर किसी पौराणिक कथा का भाग नहीं है। यह हकीकत है और उसे साबित करने के लिए पुरातत्व की खोज का सहारा लिया जाता है। इन दावों के लिए १२००० BCE याने इसा मसी पूर्व की घटनाये इनमे बया की गयी है।
कृष्ण की उपस्थिति के दौरान द्वारका का निम्नलिखित विवरण भागवत पुराण (श्रीमद-भागवतम; १०.६.९.१-१२) में ऋषि नारद की यात्रा के संबंध में दर्शाया गया है।
शहर पार्कों और मौज-मस्ती के बगीचों के चारों ओर उड़ने वाले पक्षियों की आवाज़ से और मधुमक्खियों से भर गया था, जबकि इसकी झीलें, खिलते हुए इंदिवर, अंभोज, कहलारा, कुमुदा और उत्पल कमल से भरी हुई थीं, इसके अलावा हौले से तैरते हुए हंसों और सारसों की पुकार से गूंज उठी थीं। द्वारका में ९००,००० शाही महलों का जिक्र किया था, और इन सभी का निर्माण क्रिस्टल और चांदी से किया गया था तथा भव्य रूप के विशाल पन्ना से सजाया गया था। एयर महलो के अंदर का भाग सोने और गहनों से अलंकृत किया था।
दुतरफा पेड़ो से भरे चौड़ी और लम्बी सड़के, चौराहे और बाज़ारों की एक सुव्यवस्थित प्रणाली देखने मिली थी, जिसमे काफी आवाजाही मौजूद थी। कई सभागृह और देवताओं के मंदिरों ने आकर्षक शहर की शोभा बढ़ाई थी। सड़कों, प्रांगणों, व्यावसायिक सड़कों और आवासीय आँगनों को पानी से छिड़का गया था और झंडे से लहराते बैनर छाँव बनकर सूरज की गर्मी से बचाये जा रहे थे।
समुद्र के नीचे विशाल स्तंभ, प्राचीन वस्तुएँ और विशाल पत्थर की दीवारें पायी गयी हैं।
निर्माण की सामग्री, मिट्टी के बर्तनों, दीवारों के खम्बे, मोतियों, मूर्तियों और मानव हड्डियों और दांतों सहित समुद्र ताल से बरामद किये हुए मलबे पर कार्बन डेटिंग ने इसे लगभग ९००० साल पुराना बताया, जिससे यह सुमेरियन सभ्यता से भी कई हजार साल पुराना हो गया है।
यहाँ तक चीनी तथा इजिप्तषियन संस्कृति से भी पुरानी सभ्यता बताई जा रही है। और हरप्पा संस्कृति से भी पुरानी बताई जाती है।
द्वारका का वर्णन, श्रीमद भगवत गीता, महाभारत, हरिवंश, स्कन्द-पुराण, विष्णु-पुराण आदि महान ग्रंथो में पाया जाता है। इन ग्रंथो के अनुसार यह शहर खम्बात की खाड़ी के दाहिने तरफ २ खंडो में तथा बायीं और ४ खंडो में विकसित था।
आज तक जो भी खोज हुई है समुन्दर के पाताल में वो सरे अवशेष इन बातो की पुष्टि करते है।



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