Wednesday, July 14, 2021

गुमनाम / बदनाम हैं कोई-भाग ६:राखीगढ़ी- हरियाणा

 


राखीगढ़ी, राखी गढ़ी (राखी शाहपुर या राखी खास). 

भारत के हरियाणा राज्य के हिसार जिले में एक गाँव है, जो दिल्ली के वायव्य दिशा में १५० किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 

यह ६५०० साल पुरानी सिंधु घाटी वसाहत का सबुत है।आगे चलकर ग्लोबल हेरिटेज फण्ड के सर्वेक्षण के अनुसार इसा पूर्व २६०० से १९०० के काल में अद्यावत सिंधु घाटी संस्कृति का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया।     

दुनिया भर के पुराने खोजकरता को राखीगढ़ी में पाए गए आकार और विशिष्टता ने विस्मयित किया है। और यह सिंधु घाटी संस्कृति के मात्र ५ प्रतिशत है , जिससे आप अंदाजा लगा सकते है कितनी विशाल थी सिंधु घाटी संस्कृति ! मोहेंजो-दाड़ो और हरप्पा जिस स्थान पर पाए गए है वह इलाका आज पाकिस्तान में है और राखीगढ़ी दिल्ली से काफी करीब हैं ।   

घग्गर-हकरा नदी के मैदान में राखीगढ़ी स्थित है, जो घग्गर नदी से २७ किमी की दुरी पर हैं। 

स्कॉटिश पुरातत्वविद् और लेखिका जेन मैकिन्टोश के अनुसार, राखीगढ़ी प्रागैतिहासिक (वो काल जिसका इतिहास नहीं लिखा गया है) द्रिशावती नदी की घाटी में स्थित है जो शिवालिक पहाड़ियों में उत्पन्न हुई थी। चौतांग सरसुती नदी की एक सहायक नदी है और सरसुती नदी घग्गर नदी की सहायक नदी है।    

२०२० तक की गयी खोज और परिक्षण बताते है की राखीगढ़ी ३५० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ हैं और एक निश्चित आकार के इसमें ११ टीले शामिल हैं। और यह संस्पर्शी याने अखंडित फैला है। 

दुनिया भर के पुराने खोजकर्ता को राखीगढ़ी में पाए गए आकार और विशिष्टता ने विस्मयित किया है। और यह सिंधु घाटी संस्कृति के मात्र ५ प्रतिशत है , जिससे आप अंदाजा लगा सकते है कितनी विशाल थी सिंधु घाटी संस्कृति ! मोहेंजो-दाड़ो और हरप्पा जिस स्थान पर पाए गए है वह जमीन आज पाकिस्तान में है और राखीगढ़ी दिल्ली से काफी करीब।   

घग्गर-हकरा नदी के मैदान में राखीगढ़ी स्थित है, घग्गर नदी से २७ किमी की दुरी पर। 

स्कॉटिश पुरातत्वविद् और लेखिका जेन मैकिन्टोश के अनुसार, राखीगढ़ी प्रागैतिहासिक (वो काल जिसका इतिहास नहीं लिखा गया है) द्रिशावती नदी की घाटी में स्थित है जो शिवालिक पहाड़ियों में उत्पन्न हुई थी। चौतांग सरसुती नदी की एक सहायक नदी है  घग्गर नदी की सहायक नदी है।

राखीगढ़ी में खुदाई का काम सन १९६९, १९९७ -९८, १९९८ –९९  तथा सन १९९९ -२०००, और सन २०११ -१६ के बीच किया गया था।

इनमे जो ११ टीले है उनका नाम RGR १ से लेकर RGR ११ यु नाम रखे है, जिनमे RGR ५ में राखिशाहपुर नामक घनी आबादी वाला गांव बसा है जिसकी वजह से यहाँ उत्खनन करना मुमकिन नहीं।    

उर्वरित क्षेत्रो में RGR ४ में भी कुछ इलाके में खुदाई संभव है। भारतीय पुरातत्व विभाग की इन क्षेत्र में की गयी विस्तृत खुदाई से खोए हुए शहर के आकार का पता चला और कई कलाकृतियाँ बरामद हुईं, कुछ ५,०००  साल से अधिक पुरानी है ! हरप्पा संस्कृति के प्रारंभिक काल में राखीगढ़ी  का अस्तित्व पाया गया है। 

पक्की सड़कों, जल निकासी व्यवस्था, बड़े वर्षा जल संग्रह, भंडारण प्रणाली, टेराकोटा ईंटे, मूर्ति निर्माण, और कांस्य तथा कीमती धातुओं के कुशल कामकाज के प्रमाण पाए गए हैं। टेराकोटा से बनी चूड़ियों, शंख, सोना और अर्ध-कीमती पत्थरों सहित आभूषण भी मिले हैं।

१९६३ के बाद १९९७ -९८, १९९८ –९९ और १९९९ -२००० में फिर से भारतीय पुरातत्व विभाग ने डॉ अमरेंद्र नाथ के नेतृत्व में खोज कार्य पुनः आरम्भ किया। उन्होंने  वैज्ञानिक पत्रिकाओं में अपने निष्कर्ष भी प्रकाशित किए। सन २००० के बाद, खोज काम में दिए गए सरकारी अर्थ सहाय में हुई धांधली की वजह से सीबीआई जांच हुई, जिसके चलते वर्षों तक खुदाई बंद कर दी गई थी। ज्यादातर खोज की हुई वस्तुए दिल्ली म्यूजियम में संगृहीत की गयी है।  

२०११-१६ से, डेक्कन कॉलेज ने अपने तत्कालीन कुलपति और पुरातत्वविद् डॉ वसंत शिंदे के नेतृत्व में  कई महत्वपूर्ण खुदाई की|टीम के कई सदस्यों ने विभिन्न अकादमिक पत्रिकाओं में अपने निष्कर्ष भी प्रकाशित किए।  

२०१४ में राखीगढ़ी में १९९७ और २००० के बीच खुदाई से छह रेडियोकार्बन डेटिंग प्रकाशित हुई थी, जो पुरातत्वविद् डॉ अमरेंद्र नाथ के अनुसार साइट पर तीन विभिन्न कालखंड के अनुरूप है।

इन सारी खोज से यह प्रमाणित होता है की राखीगढ़ी में हरप्पा की प्रारंभिक तथा उसकी प्रगत संस्कृति का असर देखने मिला है, जिसमे ४६०० साल पुराने दुर्ग, कंकाल और ईंटो के काम पाए गए है। 

राखीगढ़ी का एक कंकाल राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित है।


 








 त्खनन बताते है की यह शहर पूर्ण रूप से सुनियोजित था, जहा १.९२ मीटर चौड़े रस्ते थे। मिट्टी के बर्तन कालीबंगा और बनावली में पाए गए खोज के समान हैं।  दीवारों से घिरे गड्ढे पाए गए हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि वे बलि चढाने की या कुछ धार्मिक समारोह के लिए थे। घरों से निकलने वाले सीवेज को संभालने के लिए ईंट की नालियां पायी गई। 

टेराकोटा की मूर्तियाँ, बाट, कांस्य की कलाकृतियाँ, कंघी, तांबे की मछली के हुक, सुई और टेराकोटा की मुहरें भी मिली हैं। एक पीतल का बर्तन मिला है जिसे सोने और चांदी से सजाया गया है। लगभग ३००० बिना पॉलिश किए हुए काम कीमती वाले पत्थर और एक सोने का ढलाई-ख़ाना भी मिला है। इन पत्थरों को चमकाने के लिए उपयोग किए जाने वाले कई उपकरण और एक भट्टी वहां मिली थी। ११ कंकालों के साथ एक कब्रस्तान  मिला है, जिनके सर की दिशा उत्तर हैं। इन कंकालों के सिरों के पास रोजाना इस्तेमाल के बर्तन रखे हुए थे। तीन नारी के कंकालों की बायीं कलाई पर खोल की चूड़ियाँ हैं। एक स्त्री के कंकाल के पास सोने की बाजूबंद मिली है। इसके अलावा, सिर के पास कम कीमती पत्थर पाए गए हैं, जिससे पता चलता है कि वे किसी प्रकार के हार का हिस्सा थे।

धान्यागर: 

ईसापूर्व २६०० से लेकर २००० के हरप्पा काल खण्ड का धान्यागर या अन्न भंडार खोज में पाया गया है। अन्न भंडार मिट्टी-ईंटों से बना होता है जिसमें मिट्टी से ढकी हुई मिट्टी की फर्श होती है। इसमें ७ आयताकार या वर्गाकार कक्ष हैं।  

धान्यागार की दीवार के निचले हिस्से पर चूने और सड़ी घास के महत्वपूर्ण निशान पाए जाते हैं जो यह दर्शाता है कि यह अनाज का भंडार भी हो सकता है जिसमें कीटनाशक के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला चूना और नमी के प्रवेश को रोकने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली घास है। विशाल आकार को देखते हुए, यह एक सार्वजनिक अन्न भंडार या श्रीमंत वर्ग का निजी अन्न भंडार हो सकता है। 

हत्यार :

यहां तांबे की हथकड़ी और मछली के काँटे जो शिकार के लिए उपयोग में लाये जाते थे, मिले हैं। कई प्रकार के खिलौनों जैसे छोटे पहिये, छोटे ढक्कन, गोफन गेंद, जानवरों की मूर्तियों का मिलना खिलौना उद्योग फैलाव दर्शाती है। फलते-फूलते व्यापार के संकेत टिकटों, गहनों और 'चर्ट' बाटों की खुदाई से देखे जा सकते हैं। यहाँ पाए जाने वाले वज़न कई अन्य खोज किये गये अन्य स्थानों पर पाए जाने वाले वज़न के समान हैं जो मानकीकृत वज़न प्रणालियों की उपस्थिति की पुष्टि करते हैं।  

संस्कृति, पहनावा और पूजा पद्धति : 

राखीगढ़ी में अग्नि वेदियों और अर्द्धगोलाकार संरचनाओं का पता चला था।  

चांदी या कांसे की वस्तुओं पर संरक्षित सूती कपड़े के निशान राखीगढ़ी, चन्हुदड़ो और हड़प्पा से मेल खाते थे। यहाँ बड़ी मात्रा में मुहरें भी मिलीं। 

इन क्षेत्र का  पुनर्वास और संरक्षण :

फरवरी २०२० को, तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने घोषणा की कि राखीगढ़ी की क्षेत्र को एक प्रतिष्ठित साइट के रूप में विकसित किया जाएगा। पुरातत्व विभाग ने RGR ४  और RGR ५  टीले पर १५२  घरों सहित साइट से अतिक्रमण हटाने की योजना शुरू की है। जिन गाँवों के घरों को साइट से हटा दिया जाएगा, उन्हें दूसरे स्थान पर आवास फ्लैटों में स्थानांतरित और पुनर्वासित किया जाएगा।        

राखीगढ़ी, जो एक सिंधु घाटी सभ्यता स्थल (Heritage site)है, में राज्य सरकार द्वारा विकसित एक संग्रहालय भी है।  

साइट म्यूजियम

६० किमी दूर हरियाणा ग्रामीण प्राचीन संग्रहालय भी है, जिसका रखरखाव चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में स्थित गांधी भवन में किया जाता है, जो कृषि के विकास और लुप्त होती प्राचीन वस्तुओं को प्रदर्शित करता है। 

जॉर्ज थॉमस के नाम से जहाज कोठी संग्रहालय फिरोज शाह पैलेस परिसर के अंदर स्थित है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा रखरखाव किया जाता है।

फिरोज शाह पैलेस 

 
जहाज कोठी संग्रहालय








No comments: