मुझिरिस (मुसीरीपट्टनम या मुसरी)
यह प्राचीन भारत का एक और खोया हुआ बंदरगाह शहर है जो पेरियार नदी के तट पर स्थित है।
"मुज़िरिस" नाम की व्युत्पत्ति बंदरगाह के मूल तमिल नाम, "मुसिरी" (तमिल: முசிறி, मलयालम: മുചിറി) से हुई है। इस क्षेत्र में, पेरियार नदी शायद एक कटे होंठ (एक असामान्य चेहरे का विकास) की तरह दो में विभाजित हो गई और इस तरह इसे "मुसीरी" नाम दिया गया, ऐसा मन जाता है। इसे अक्सर संगम कविताओं में मुसिरी, संस्कृत महाकाव्य रामायण में मुरासीपट्टनम और ११ वीं शताब्दी के चेरा शासक के काल में मुयरीकोट्टू के रूप में जाना जाता है।
पुरातत्वविदों ने मिस्र, यमन, रोमन और पश्चिम एशिया जैसे देशों से संबंधित विभिन्न कलाकृतियों की यहाँ खोज की है जिससे मुझिरिस का बाहरी दुनिया के संबंध का पता चलता है।
पहली शताब्दी ईसा पूर्व में यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाहों में से एक था। यहाँ से काली मिर्च पूरी दुनिया को निर्यात होती थी।
इसका सबसे बड़ा व्यापारी रोम था। उन दिनों भी यह मसाले इतने महंगे थे की रोम कर्जे में डूब गया।
करीब २००० साल पाहिले मुझिरिस काफी बड़ा व्यापार केंद्र था। उन दिनों तमिल भाषा में संकलित कविता जो अकनानुरू नाम से प्रसिद्ध थी उसमे भी इस बंदरगाह का वर्णन कुछ यु है ! " यह एक ऐसा शहर है जहाँ सुंदर बर्तन, यवनों की याने पश्चिमी उत्कृष्ट कृतियाँ पायी जाती है, केरल की नदी पेरियार पर सफेद झाग फैलता हुआ, और विदेशी लोगोका यहाँ सोना लेकर आना और बदले में काली मिर्च ले जाना, यह मुझिरिस की पहचान हुई थी। रोमन लेखक प्लिनी ने अपने प्राकृतिक इतिहास में मुज़िरिस को "भारत का पहला एम्पोरियम" याने बिक्री भंडार कहा।
यह शहर, रोम के तबुला प्यूटिंजीरियना, जो पांचवीं शताब्दी का नक्शा है, उस पर मुख्यत्व रूप से दिखाई देता है।
मगर आधुनिक भारत में, मुज़िरिस एक वास्तविक शहर की तुलना में एक भूली हुई दास्ताँ थी जब तक कि सन २००४ में दक्षिणी राज्य केरल में पुरातात्विक खुदाई शुरू नहीं हुई। तब जाकर ये एक रहस्यमय तरीकेसे खोए हुए बंदरगाह के रूप में दुनिया के सामने आया। खोद के वक़्त पुरातत्व विभाग के लोगो को तब कोई कल्पना नहीं थी पर अब उन्हें और इतिहासकारों को भी यकीन हो गया की उन्होंने प्रख्यात मुझिरिस की खोज की।
रोम टोर वर्गाटा विश्वविद्यालय में रोमन इतिहास के सहयोगी प्रोफेसर फेडेरिको डी रोमनिस कहते हैं, "यह रोमन व्यापार के लिए आला दर्जे का केंद्र था, जहासे हजारो टन काली मिर्च रोम को निर्यात होती थी। "
डी रोमनिस आगे कहते है की काली मिर्च के अलावा हस्तिदंत, मोती, मालाबत्रुम मसाले जैसे स्थानीय चीजों का और देश भर से कीमती रत्न, नीलम, चीनी सिल्क, बेरिल नामक अनमोल पथ्थर, कछुए का कचकड़ा (shell), रेशम और सुगंधित जड़ नार्ड (जटामांसी-गांगेय क्षेत्र में पाया जाता एक सुवासिक तेल) आदि यही से निर्यात होते थे। इससे यह बात प्रतीत होती थी के हिमालय प्रान्त के लोगो से भी इनका व्यापारिक सम्बन्ध तब भी दृढ़ था। और आने वाले रोमन जहाज, सोना, मूंगा, बढ़िया कांच के बने पदार्थ, नक्काशी भरी लिनेन, बहुरंगी वस्त्र, सुरमा का सल्फाइड, शराब के एम्फ़ोरा, जैतून का तेल, तांबा, टिन, सीसा, कोरलड्रॉ ग्लास, रियलगर और ऑर्पिमेंट और किण्वित या खमीरीकृत मछली सॉस- जिसे गरूम कहते है आयात होता था।
५ वि सदी में रोमन व्यापर काम होते गया लेकिन मुझिरिस ने दुनिया बाकी देशो से जैसे परसिया, चीन और अरब से अपना व्यापार जारी रखा था |
The Silk Road
यह बंदरगाह १४ वी महाप्रलय मे विनाश हुआ |
बिना किसी निशान के, संभवतः १३४१ में एक प्रलयकारी घटना के कारण, पेरियार में एक "चक्रवात और बाढ़" जिसने क्षेत्र के भूगोल को बदल दिया और मुज़िरिस पुरातनता के हर ज्ञात नक्शे से गायब हो गया ।
इतिहासकार राजन गुरुक्कल और डिक व्हिटाकर ने "इन सर्च ऑफ मुज़िरिस" नामक एक अध्ययन में कहा है कि इस घटना ने कोच्चि में वर्तमान बंदरगाह और वेम्बनाड बैकवाटर सिस्टम को समुद्र में खोल दिया और भूमि का एक नया रूप जिसे अब वाइपेन के रूप में जाना जाता है निर्माण किया । कोच्चि के पास द्वीप, "निस्संदेह पेरियार नदी तक पहुंच बदल गई, लेकिन भूगर्भीय रूप से यह प्राचीन काल से [वहां] होने वाले भौतिक परिवर्तनों और भूमि निर्माण का सबसे शानदार था"। उनके अनुसार, उदाहरण के लिए, क्षेत्र के एक भूभौतिकीय सर्वेक्षण से पता चला है कि २००-३०० साल पहले तटरेखा वर्तमान तट से लगभग तीन किलोमीटर पूर्व में थी और लगभग २००० साल पहले यह और भी पूर्व में, लगभग ६.५ किमी अंतर्देशीय थी। "यदि रोमन काल में मुज़िरिस यहाँ कहीं स्थित होता, तो उस समय का तट अपनी वर्तमान रेखा से लगभग ४-५ किमी पूर्व में चला होता। नदी के मुहाने की नियमित गाद ने अंततः इसे एक बंदरगाह के रूप में गतिविधि को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया।"
https://www.google.com/amp/s/www.onmanorama.com/travel/travel-news/2018/07/22/periyar-floods-muziris-port.html
२००६-०७ में केरल ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद (केरल राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा आउटसोर्स की गई एक स्वायत्त संस्था) द्वारा कोचीन के पास पट्टनम गांव में खुदाई की एक श्रृंखला आयोजित की गई और यह घोषणा की गई कि मुज़िरिस का खोया हुआ "बंदरगाह" मिल गया हैं |


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