लुनी नदी किनारे बसे हुए धोलावीरा में प्राचीन हिन्दू सभ्यता कि हड़प्पा संस्कृति के दर्शन होते है। यह पृथ्वी कि कर्क रेखा पर स्थित है। यह हड़प्पा के पांच सबसे बड़े स्थलों में से एक है और सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित भारत में सबसे प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में से एक है। इसे अपने समय का सबसे भव्य शहर भी माना जाता है। यह कच्छ के महान रण में कच्छ रेगिस्तान वन्यजीव अभयारण्य में खादिर बेट द्वीप पर स्थित है। द्वीप को गुजरती में बेट कहते है। १२० एकड़ जमीन पर फैला, चतुर्भुज शहर दो मौसमी धाराओं के बीच स्थित है, उत्तर में मानसर और दक्षिण में मनहर। यह २६५० इसा पूर्व संस्कृति होने का दावा किया जाता है। इसका २१०० इसा पूर्व तक धीरे धीरे पतन होने लगा फिर इसा पूर्व १४५० में फिर से यह बसने लगा। हालाकि, लेटेस्ट खोज के अनुसार ३५०० इसा पूर्व काल में याने हरप्पा संस्कृति फलने के पूर्व यहाँ संस्कृति फली थी जो सन ३५०० इसा पूर्व तक अस्तित्व में थी याने के हरप्पा कि संस्कृति के साथ !
भारतीय खनन पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के जे. पी. जोशी द्वारा १९६७-६८ में इस साइट की खोज की गई थी, और आठ प्रमुख हड़प्पा स्थलों में से पांचवां सबसे बड़ा स्थल है । इस पुरातत्व विभाग का कहना है कि धौलवीरा कि खोज इस सिंधु घाटी सभ्यता कि खोज को नयी दिशा देती है।
धोलावीरा शहर का आयताकार आकार और संगठन है, और यह २२ हेक्टेयर (५४ एकड़) में फैला हुआ है। हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो के विपरीत, इस शहर का निर्माण पहले से मौजूद ज्यामितीय योजना के अनुसार किया गया था जिसमें तीन प्रकार कि रचना शामिल थी - १ गढ़ के स्वरुप में, २ मध्य शहर और ३ निचला शहर, जो हमें हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो कि शैली में नहीं देखने मिलता। एक्रोपोलिस याने दुर्ग या किले का क्षेत्र और मध्य शहर को अपने स्वयं के रक्षा-कार्य, प्रवेश द्वार, निर्मित क्षेत्रों, सड़क प्रणाली, कुओं और बड़े खुले स्थानों से सुसज्जित किया गया था। दुर्ग क्षेत्र शहर का सबसे जटिल क्षेत्र है, जहा से दक्षिण-पश्चिमी क्षेत्र के बड़े हिस्से पर कब्जा कर सकता है। विशाल "महल" स्टैंड का बचाव दोहरे प्राचीर द्वारा किया जाता है। इसके पश्चात् जो इलाका आता है उसे बेली - कोर्टयार्ड या आँगन कहा जाता था और जहा खास सरकारी अफसर रहते थे । इसके आगे व्यापक संरचना वाले और क्षेत्र हैं जो बाहर हैं मगर गढ़वाले बंदोबस्त के अभिन्न अंग हैं।
शहर की सबसे खास बात यह है कि इसकी सभी इमारतें, कम से कम अपने संरक्षण की वर्तमान स्थिति में, पत्थर से बनी हैं, जबकि हड़प्पा और मोहनजो-दड़ो सहित अधिकांश अन्य हड़प्पा स्थल लगभग विशेष रूप से ईंट से बने हैं। धोलावीरा दो चैनलों से घिरा है; जिसमे अक्सर तूफानी हवामान रहता है, उत्तर में मानसर और दक्षिण में मनहर। टाउन स्क्वायर में, जमीन से ऊपर एक क्षेत्र है, जिसे "गढ़" कहा जाता है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के भूतपूर्व संयुक्त महानिदेशक श्री बिश्त का कहना है कि तीसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व में पायी गयी पानी के संरक्षण, संचयन और भंडारण के लिए विकसित धोलावीरा के हड़प्पावासियों की कुशल प्रणाली, उनकी उन्नत हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदहारण है । चैनलों और जलाशयों की जटिल जल संरक्षण प्रणाली, जो पूर्णता पथ्थरो से बनाई गयी थी, धोलावीरा कि विशेषता है, जो उन दिनों दुनिया में कही नहीं पायी जाती थी। शहर में विशाल जलाशय है जिनमे ३ कि खोज हुई है। इनका उद्देश्य बारिश का पानी या पास के नाले का पानी जतन करना था। कुल १६ छोटे बड़े जलाशय का निर्माण हुआ था। कुछ उत्तर-पूर्व से उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित कुदरती ढलान का सहारा लेकर जलाशय बनाये तो कुछ जलाशय के लिए खुदाई कि गयी। जलाशयों के लिए पत्थर को लम्ब रूप से काटा गया है, जो लगभग ७ मीटर (२३ फीट) गहरी और ७९ मीटर (२५९ फीट) लम्बी कटाई की है। वे शहर को घेरते हैं, जबकि गढ़ और स्नानागार ऊंचाई पर याने टीला के बीच में स्थित हैं। यहां एक बड़ा कुआं भी है, जिसमें पत्थर से बनी एक कुंड है, जो इसे एक नाले से जोड़ती है, जो जलाशय तक तक पानी पहुंचाने का काम करती है। इन नहाने के टैंक में उतरने के लिए सीढिया भी बानी है। एक कुंवा तो मोहेंजो दादो के सबसे बड़े स्नानघर से ३ गुना बड़ा है !
धोलावीरा में मिले कुछ मुहरों में चरण ३ से संबंधित, बिना किसी प्रकार की लिपि के केवल जानवरों की नक्काशी पाई गयी । यह इस बात की और इशारा करती है कि इस प्रकार की मुहरें सिंधु मुहर बनाने की प्रारंभिक परंपराओं का असर पड़ा हैं।
धोलावीरा में सात अर्धगोलाकार निर्माण पाए गए, जिनमें से दो का विस्तार से उत्खनन किया गया, जिनका निर्माण बड़े चट्टानों को काटकर किए गए कक्षों पर किया गया था। खुदाई की गई संरचनाओं में से एक को स्पाइक वाले पईये के रूप में डिजाइन किया गया था। दूसरे को भी उसी तरह से डिजाइन किया गया था, मगर बिना स्पाइक के।
हालाकि इनमे उनमें मिट्टी के बर्तनों दफनाए थे, मगर एक कब्र में एक कंकाल और तांबे का दर्पण मिला। दोनों सिरों पर हुक के साथ तांबे के तार से बंधे स्टीटाइट मोतियों का एक हार, एक सोने की चूड़ी, सोना और अन्य मोतियों को भी एक गोलार्द्ध की संरचना में पाया गया था।
इसके अलावा, नुकीले आधार वाले बड़े काले रंग के घड़े भी पाए गए हैं। एक विशाल कांस्य हथौड़ा, एक बड़ी छेनी, एक कांस्य हाथ से पकड़ा हुआ दर्पण, एक सोने का तार, सोने का कान का स्टड, छेद के साथ सोने के गोले, तांबे के सेल्ट और चूड़ियाँ, खोल की चूड़ियाँ, पत्थर के फालुस जैसे प्रतीक, सिंधु शिलालेख के साथ चौकोर सील संकेत, एक गोलाकार मुहर, कूबड़ वाले जानवर, चित्रित रूपांकनों के साथ मिट्टी के बर्तन, गोबलेट, डिश-ऑन-स्टैंड, छिद्रित जार, अच्छे आकार में टेराकोटा के गिलास, गिट्टी के पत्थरों से बने वास्तुशिल्प सदस्य, पीसने वाले पत्थर, मोर्टार आदि भी पाए गए थे।
सुरक्षित किले के एक महाद्वार के ऊपर उस जमाने का साईन बोर्ड पाया गया है, जिस पर दस बड़े-बड़े अक्षरो में कुछ लिखा है, जो पांच हजार साल के बाद आज भी सुरक्षित है। वह महानगर का नाम है अथवा प्रान्त अधिकारियों का नाम, यह आज भी एक रहस्य है। ऐसा लगता है जैसे नगरजनो का स्वागत हो रहा हों? सिन्धु घाटी की लिपि आज भी एक अनसुलझी पहेली है।
विनाश :
मोहेंजो दडो कीं तरह इस नगर कीं रचना इंटो पत्थरोसे हुई थी और कहते हैं कीं ७ बार बहाड मे यह डुबा था और हर बार फिरसे उसे बसाया गया था | अधिकाश यही मानना हैं कीं कुदरती कहर से यह संस्कृती विलुप्त हुई |
ढोलाविरा अब युनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट घोषित किया गया है |
https://youtu.be/XrkTyJvhy0c
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