यह एक विश्व विरासत स्थल है|
उत्पत्ति
इस साम्राज्य की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न दंतकथाएँ भी प्रचलित हैं। इनमें से सबसे अधिक विश्वसनीय यही है कि संगम के पुत्र हरिहर तथा बुक्का ने हम्पी हस्तिनावती राज्य की नींव डाली और विजयनगर को राजधानी बनाकर अपने राज्य का नाम अपने गुरु के नाम पर विजयनगर रखा।
१४ वी सदी में दख्खन क्षेत्र में प्रमुख रूप से ककातिया राजवंश, सुएना / सुवेना यादवी वंश, होयसाला और छोटे काल के लिए राज करनेवाले कम्पिली राज्य इन सभी पर बाहरी सैनिको द्वारा हमले हुए, जिसमे अल्लाउद्दीन खिलजी की विशाल सैन्य और उसके बाद दिल्ही सल्तनत के तुग़लक़ राजवंश की सेना आदि प्रमुख रूप में थी। इन हमलो में यहाँ के स्थानीय राजवंश, राजा और प्रजा, साथ में मंदिर आदि सभी को लुटा गया, खंडहर बना दिया। आगे चलकर संगमा भाइयोंने(हरिहर राय और बुक्का राय इन्ही खण्डहरों से विजयनगर की स्थापना की। कंपलीदेवराय राजा, जो कम्पिली राज्य के राजा थे, उनके यहाँ ये दोनों भाई बतौर सैनिक थे। विजयनगर केंद्रित साम्राज्य ने उत्तर में मुस्लिम सल्तनतों के लिए एक बाधा के रूप में कार्य किया, जिससे हिंदू जीवन, विद्वता, बहु-धार्मिक गतिविधि, तेजी से बुनियादी ढांचे में सुधार और आर्थिक गतिविधि का पुनर्निर्माण हुआ।
हिंदू धर्म के साथ, विजयनगर ने जैन धर्म और इस्लाम जैसे अन्य धर्मों के समुदायों को स्वीकार किया, जिससे बहु-धार्मिक स्मारकों और आपसी प्रभाव पैदा हुए। फारसी और यूरोपीय यात्रियों द्वारा छोड़े गए इतिहास में विजयनगर को एक समृद्ध और धनि शहर बताया गया है। १५०० इसा तक, हम्पी-विजयनगर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मध्ययुगीन युग शहर (बीजिंग के बाद) था और शायद उस समय भारत का सबसे अमीर शहर था, जो पर्शियन और पुर्तगाल के व्यापारियों को आकर्षित करता था। १६ वीं शताब्दी तक आसपास के मुस्लिम सल्तनत और हिंदू विजयनगर के बीच युद्ध जारी रहे। १५६५ में, विजयनगर के नेता आलिया राम राय को पकड़ लिया गया और मार दिया गया, और शहर दक्कन के मुस्लिम सल्तनत के गठबंधन में गिर गया। विजयनगर को दिल्ली सल्तनत ने अपने कब्जे में ले लिया और छह महीनो तक उसे लुटते रहे।
शताब्दियों से दक्षिण भारत के हिंदू नरेश इस्लाम का विरोध करते रहे, अतएव बहमनी सुल्तानों से शत्रुता बढ़ती ही गई। मुसलमानी सेना के पास अच्छी तोपें तथा हथियार थे, इसलिए विजयनगर राज्य के सैनिक इस्लामी बढ़ाव के सामने झुक गए। विजयनगर शासकों द्वारा नियुक्त मुसलमान सेनापतियों ने राजा को घेरवा दिया अतएव सन् 1565 ई. में तलिकोट के युद्ध में रामराय मारा गया। मुसलमानी सेना ने विजयनगर को नष्ट कर दिया जिससे दक्षिण भारत में भारतीय संस्कृति की क्षति हो गई। अरवीदु के निर्बल शासकों में भी वेकंटपतिदेव का नाम धिशेषतया उल्लेखनीय है। उसने नायकों को दबाने का प्रयास किया था। बहमनी तथा मुगल सम्राट में पारस्परिक युद्ध होने के कारण वह मुग़ल सल्तनत के आक्रमण से मुक्त हो गया था। इसके शासनकाल की मुख्य घटनाओं में पुर्तगालियों से हुई व्यापारिक संधि थी। शासक की सहिष्णुता के कारण विदेशियों का स्वागत किया गया और ईसाई पादरी कुछ सीमा तक धर्म का प्रचार भी करने लगे। वेंकट के उत्तराधिकारी निर्बल थे। शासक के रूप में वे विफल रहे और नायकों का प्रभुत्व बढ़ जाने से विजयनगर राज्य का अस्तित्व मिट गया।
भारतीय साहित्य के इतिहास में विजयनगर राज्य का उल्लेख अमर है। तुंगभद्रा की घाटी में ब्राह्मण, जैन तथा शैव धर्म प्रचारकों ने कन्नड भाषा को अपनाया जिसमें रामायण, महाभारत तथा भागवत की रचना की गई। इसी युग में कुमार व्यास का आविर्भाव हुआ। इसके अतिरिक्त तेलुगू भाषा के कवियों को बुक्क ने भूमि दान में दी। कृष्णदेव राय का दरबार कुशल कविगण द्वारा सुशोभित किया गया था। संस्कृत साहित्य की तो वर्णनातीत श्रीवृद्धि हुई। विद्यारण्य बहुमुख प्रतिभा के पण्डित थे। विजयनगर राज्य के प्रसिद्ध मंत्री माधव ने मीमांसा एवं धर्मशास्त्र सम्बन्धी क्रमश: जैमिनीय न्यायमाला तथा पराशरमाधव नामक ग्रन्थों की रचना की थी उसी के भ्राता सायण ने वैदिक मार्गप्रवर्तक हरिहर द्वितीय के शासन काल में हिन्दू संस्कृति के आदि ग्रन्थ वेद पर भाष्य लिखा जिसकी सहायता से आज हम वेदों का अर्थ समझते हैं। विजयनगर के राजाओं के समय में संस्कृत साहित्य में अमूल्य पुस्तकें लिखी गईं।
हिन्दू संस्कृति के इतिहास में विजयनगर राज्य का महत्वपूर्ण स्थान रहा। विजयनगर की सेना में मुसलमान सैनिक तथा सेनापति कार्य करते रहे, परन्तु इससे विजयनगर के मूल उद्देश्य में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। विजयनगर राज्य में सायण द्वारा वैदिक साहित्य की टीका तथा विशाल मन्दिरों का निर्माण दो ऐसे ऐतिहासिक स्मारक हैं जो आज भी उसका नाम अमर बनाए हैं।
बौद्ध, जैन तथा ब्राह्मण मतों का प्रसार दक्षिण भारत में हो चुका था। विजयनगर के राजाओं ने शैव मत को अपनाया, यद्यपि उनकी सहिष्णुता के कारण वैष्णव आदि अन्य धर्म भी पल्लवित होते रहे। विजयनगर की कला धार्मिक प्रवृत्तियों के कारण जटिल हो गई। मन्दिरों के विशाल गोपुरम् तथा सुन्दर, खचित स्तम्भयुक्त मण्डप इस युग की विशेषता हैं। विजयनगर शैली की वास्तुकला के नमूने उसके मन्दिरों में आज भी शासकों की कीर्ति का गान कर रहे हैं।
इस साम्राज्य के विरासत के तौर पर हमें संपूर्ण दक्षिण भारत में स्मारक मिलते हैं जिनमें सबसे प्रसिद्ध हम्पी के हैं। दक्षिण भारत में प्रचलित मंदिर निर्माण की अनेक शैलियाँ इस साम्राज्य ने संकलित कीं और विजयनगरीय स्थापत्य कला प्रदान की। दक्षिण भारत के विभिन्न सम्प्रदाय तथा भाषाओं के घुलने-मिलने के कारण इस नई प्रकार की मंदिर निर्माण की वास्तुकला को प्रेरणा मिली। स्थानीय कणाश्म पत्थर का प्रयोग करके पहले दक्कन तथा उसके पश्चात् द्रविड़ स्थापत्य शैली में मंदिरों का निर्माण हुआ। धर्मनिर्पेक्ष शाही स्मारकों में उत्तरी दक्कन सल्तनत की स्थापत्य कला की झलक देखने को मिलती है।
शासकों की सूची दिखाती हैं यह कितना बडा साम्राज्य था :
संगम वंश
हरिहर राय १ 1336-1356
बुक्क राय १ 1356-1377
हरिहर राय २ 1377-1404
विरुपाक्ष राय 1404-1405
बुक्क राय २ 1405-1406
देव राय १ 1406-1422
रामचन्द्र राय 1422
वीर विजय बुक्क राय 1422-1424
देव राय २ 1424-1446
मल्लिकार्जुन राय 1446-1465
विरुपक्ष राय २ 1465-1485
प्रौढ राय 1485
सलुव वंश
सलुव नरसिंह देव राय 1485-1491
थिम्म भूपाल 1491
नरसिंह राय २ 1491-1505
तुलुव वंश
वीरनरसिंह राय 1503-1509
कृष्ण देव राय 1509-1529
अच्युत देव राय 1529-1542
सदाशिव राय 1542-1570
अरविदु वंश
अलिय राम राय 1542-1565
तिरुमल देव राय 1565-1572
श्रीरंग १ 1572-1586
वेंकट २ 1586-1614
श्रीरंग २ 1614-1614
रामदेव अरविदु 1617-1632
वेंकट ३ 1632-1642
श्रीरंग ३ 1642-1646
वीरूपक्ष मंदिर का राया गोपुरहम्पी के रघुनाथ मन्दिर का शिखर


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