Wednesday, July 1, 2020

रामेश्वरम मंदिर - रामेश्वरम - तमिल नाडु

                           पाम्बन पुल
रामेश्वरम मंदिर

तमिल नाडु के सेथु किनारे से कुछ दुरी पर समुद्र में स्थित रामेश्वरम टापू है जहा विश्व प्रसिद्द रामेश्वरम मंदिर है। हम यह पाम्बन पुल के जरिये जा सकते है             

इस मंदिर की विशेषताएं है, इसका बहु चर्चित  अलंकारिक गलियारा, दो विशालकाय टॉवर और कुल ३६ तीर्थम 

दक्षिण भारत के १२ ज्योतिर्लिंग में से एक रामेश्वरम का ज्योतिर्लिंग है और काशी बनारस की तरह यह भी एक तीर्थस्थान है। 
  
इस ज्योतिर्लिंग का रामायण से और लंका की जी से सम्बन्ध है।

आईये जानते है क्या है ये सम्बन्ध !

रामायण के अनुसार भगवान श्री प्रभु रामचंद्र जी ने इस मंदिर की स्थापना की थी। जब वे सीता मैया की खोज में और रावण से युद्ध करने के लिए श्रीलंका जा रहे थे, तभी इस जगह उन्होंने रेत से शिवलिंग की स्थापना की और पूजा की थी।

कहा जाता है के स्थापना के पहिले जब श्री प्रभु रामचंद्र जी यहाँ समुन्दर किनारे पानी पी रहे थे तभी एक आकाशवाणी हुई : "तुम मेरी पूजा किये बगैर पानी पी रहे हो !" 

यह सूनकर श्री प्रभु रामचंद्र जी ने पहले रेत से शिवलिंग की स्थापना की और उसकी पूजा की और भगवान शिवजी से अरज की : "कृपा करके आप मुझ पर प्रसन्न हो, ताकि मै लंका जाकर रावण पर जित प्राप्त कर सकू !"

 इसपर शिवजीने प्रसन्न होकर श्री प्रभु रामचंद्र जी को विजयी होने का आशीर्वाद दिया !

फिर श्री प्रभु रामचंद्रजी ने भगवान शिवजी से अरज की के वे यहाँ इस लिंग में सदा के लिए निवास करे ताकि मनुष्य जाती का कल्याण हो
इसपर भगवान शिवजी प्रगट होकर लिंग में प्रवेश कर अनंतकाल के लिए उस लिंग में निवासित हुए।









दुसरी कथा के अनुसार जब श्री प्रभु रामचंद्रजी, सीता मैय, भ्राता लक्ष्मण तथा अपनी सेना के साथ अयोध्या लौट रहे थे तब सीता मैया ने यहाँ मिटटी से शिवलिंग की स्थापना की थी।  

कहा जाता है के हनुमानजी को कैलाश परबत से विश्वनाथ की छबि लाने का काम सौंपा गया था। मगर इस काम में देर होने की आशंका देख प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने शुभ मुहूर्त तय कर शिवलिंग की पूजा की।

इस भव्य मंदिर का विस्तार १५ एकड़ जमीं पर फैला है। जिसमे बुलंद गोपुरम, विशाल दीवारे और नंदी की प्रचंड मूर्ति आदी है।   

पर जैसे पहिले बताया इसमें ४००० स्तम्भ वाली बहु  चर्चित अलंकारिक गलियारा या कॉरिडोर है जो तक़रीबन ३८५० फिट लम्बी है। इसे पांड्या और जाफना राजाओं ने बनाया है। 

नक्काशीदार ग्रेनाइट के खंभे एक उभरे हुए मंच पर लगे हैं। 
जिन पथ्थरों को इस मंदिर के निर्माण में लगाया है वह पथ्थर रामेश्वरम टापू में नहीं मिलते। 

जिसका मतलब यह है की इन विशालकाय पथ्थरोंको मुख्य भूमि से याने तमिलनाडु से जहाजो से लाया गया था !
 



४००० स्तम्भ वाली बहु  चर्चित अलंकारिक गलियारा

मुलत: यह एक छोटी सी झुपड़ी थी जिसकी एक साधु निगरानी करता था। 
आगे चलकर कई राजाओ ने इसकी पुनर्रचना करने में योगदान दिया, जिसमे रामनाड के सेथुपथि विशेष है। 
 
श्रीलंका के राजा पराक्रमाबाहुने १२वी सदी में श्री रामनाथस्वामी, श्री विश्वनाथ और श्री विसालाक्षी को समेटते हुए इस पवित्र स्थान का निर्माण किया। 
राजा पराक्रमाबाहु


मंदिर में ३ कॉरिडोर (गलियारा) है जिसे प्रहाराम भी कहा जाता है। बाहरी गलियारे को बड़ी संख्या में खंभों के साथ एक निरंतर मंच द्वारा दोनों तरफ से घेरा हुआ है, जिन पर बड़े गहन से बनाई हुई मुर्तिया है। 

उत्तर और दक्षिणी गलियारा सबसे लम्बे गलियारे है जो प्रत्येक सिरे से स्तंभों की पुनरावृत्ति का एक परिदृश्य प्रस्तुत करते हैं। और यह प्राचीन वास्तुकारों और शिल्पकारों की भव्यता और सटीकता से सभी को अचंभित करता है।

पूर्व मे स्थित राजगोपुरम की ऊंचाई १२६ फुट है, जिसमे ९ माले या लेयर है ! जबकि पश्चिमी राजगोपुरम भी काफी प्रभावशाली है और तक़रीबन ऊंचाई ७८ फुट है ! 

मंदिर में अन्य देवताओं की भी छोटी मुर्तिया है। इनके अलावा विश्वनाथ नायकर और कृष्णामा नायकर की  
मूर्तियों के साथ नंदी बैल की १२ फुट लम्बी और ९ फुट ऊँची मूर्ति है।

रामलिंगेश्वर के अंधरुनि खंड में शिवलिंग है, 
जिसके दोनों तरफ से घेरती हुई ऊंची दीवारें हैं, जो दरअसल गोपुरम का विशाल प्रवेशद्वार है, जो आयत कोण के आकार मे है। 

यहाँ २२ कुंड है जिसमे श्रद्धालु नहाकर अंदर दर्शन के लिए जाते है।
रामेश्वरम की पवित्र तीर्थयात्रा         

रामेश्वरम में तीर्थयात्रा प्राचीन समय से हिंदू पर रखी गई महत्वपूर्ण व्यादेश याने विशेष आदेश है। 
श्री रामेश्वरम का मंदिर काशी की परंपरा के साथ जुड़ा हुआ है। 

काशी की तीर्थ यात्रा तब तक अधूरी मानी जाती है जब तक आप यहाँ रामेश्वरम मंदिर का दर्शन नहीं लेते। 

पुराने ज़माने में श्रद्धालुओं का जथ्था, जिनमे अधिकतर लोग बुजुर्ग थे, दोनों मंदिरों के दर्शन के लिए महीनो या सालो तक चलते जाते थे। कुछ इस अविश्वसनीय लम्बी यात्रा के दौरान मृत्यु को पाते थे।

दक्षिणी भारत में रामेश्वरम की तीर्थ यात्रा एक परंपरा मानी जाती है। जिसके लिए कई लोकगीत बनाये गए है। रामेश्वरम में विजय के स्तंभ लगाए जाने पर, कई पुराने राजाओं ने खुद की प्रतिमाये लगाई जैसे के १०वीं      शताब्दी में होयसला के कृष्ण तृतीय राष्ट्रकूट, और १२ वीं शताब्दी के विष्णुवर्धन।




                    
विष्णुवर्धन
यहाँ हाल ही में आधुनिक भारत वर्ष के प्रख्यात वैज्ञानिक तथा राष्ट्राध्यक्ष स्व. ए पी जे अब्दुल कलाम जी की मूर्ति भी स्थापित की गयी है, जो भारत की संस्कृति की बहुत बड़ी झांकी दिखाती है।

ए पी जे अब्दुल कलाम जी की मूर्ति




जय हिन्द - जय भारत


v वा VILAS

2 comments:

Ramesh Kumar M.G said...

English please

Anonymous said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति