मध्यप्रदेश के छत्तरपुर जिलेमे खजुराहो ग्रुप ओफ मोन्युमेंट्स है जिसमे हिंदू तथा जैन धर्म के कई मंदिर है।
इसे यूनेस्को ने विश्व विरासत घोषित किया गया है। यह मंदिर अपनी नगाडा शैली की झांकी दिखाती है अौर कामुक पोज के लिये यह मुर्तिया दुनिया भर मे प्रसिद्ध है।
१० वी सदी में इसका निर्माण किया गया था। अब यह पार्स्वनाथ / पार्श्व / पारस को समर्पित है।
यह संभवत: चंडेला राजघराना के शासन काल में के धांगा या धंगादेवा राजा ने आदिनाथ नामसे मंदिर बनाया था। (शिलालेखों में धांगदेव के नाम से जाना जाने वाला धंगा (सं. 950-999 CE), भारत के चंदेला वंश का एक राजा था। उन्होंने जेजाकभुक्ति क्षेत्र (वर्तमान मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड) में शासन किया। धनंगा या धंगा ने चंदेलों की संप्रभुता की स्थापना की, जिन्होंने राज करने तक प्रतिहारों को जागीरदार के रूप में सेवा दी थी।)
इसे यूनेस्को ने विश्व विरासत घोषित किया गया है। यह मंदिर अपनी नगाडा शैली की झांकी दिखाती है अौर कामुक पोज के लिये यह मुर्तिया दुनिया भर मे प्रसिद्ध है।
१० वी सदी में इसका निर्माण किया गया था। अब यह पार्स्वनाथ / पार्श्व / पारस को समर्पित है।
यह संभवत: चंडेला राजघराना के शासन काल में के धांगा या धंगादेवा राजा ने आदिनाथ नामसे मंदिर बनाया था। (शिलालेखों में धांगदेव के नाम से जाना जाने वाला धंगा (सं. 950-999 CE), भारत के चंदेला वंश का एक राजा था। उन्होंने जेजाकभुक्ति क्षेत्र (वर्तमान मध्य प्रदेश में बुंदेलखंड) में शासन किया। धनंगा या धंगा ने चंदेलों की संप्रभुता की स्थापना की, जिन्होंने राज करने तक प्रतिहारों को जागीरदार के रूप में सेवा दी थी।)
जैन धर्म से सम्बंधित होने के बावजूद बाहरी दीवारों पर वैष्णो वाटि विषयो पर आधारित शिल्पकला देखने मिलती है।
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| मेजिकल क्यूब |
मुख्य प्रवेशद्वार पर दसवीं सदी में कोरा हुआ मेजिकल क्यूब है जो काफी प्रसिद्ध है।
इसमें १ से १६ तक सभी आकड़े है।
यही नहीं हर ४ संलग्न चौकोन का जोड़ भी ३४ आता है !
दूसरे, तीसरे और चौथे क्यूब में हर पिले और बैंगनी चौकोन का जोड़ ३४ आता है।
और पांचवे क्यूब में चुने हुए पिले क्यूब के और बैंगनी क्यूब के अपने अपने जोड़ भी ३४ है।
छट्ठे क्यूब में चुने हुए पिले संख्या का जोड़ भी ३४ आता है।
और अंतिम सातवे क्यूब में फिर से पिले आकड़ो का जोड़ और बैंगनी आकड़े का जोड़ भी ३४ आता है !
| 7 | 12 | 1 | 14 |
| 2 | 13 | 8 | 11 |
| 16 | 3 | 10 | 5 |
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यहाँ पिले चौकोन का जोड़ ३४ है, तो
बैंगनी चौकोन का जोड़ भी ३४ है।
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कोई भी आकड़ा दोहराया गया नहीं है। यही वजह है के यह मेजिकल क्यूब दुनियाभर में प्रसिद्ध है।
इतिहास :
कहा जाता है के साल ९५० से लेकर साल ९७० तक प्रसिद्ध जैन कुटुंब ने इसकी निर्मिति की थी।
मंदिर के बाएं दरवाज़े पर जांब (जांब शब्द-फ्रेंच के जंबे से आता है) वास्तुकला में, एक चौखट या अन्य छेद का साइड-पोस्ट या अस्तर है, साथ ही उपहारों और बगीचों के धर्मादा के बारे में शिलालेख खुदी हुई है।
बगीचों के नाम पहिला वाटिका, चंद्र वाटिका, लघुचंद्र-वाटिका, शंकर-वाटिका, पञ्चैताला-वाटिका, आम्रा-वाटिका और धांगा-वाड़ी है।
शिलालेख में श्री पहिला को श्री जिनानाथ के भक्त के रूप में वर्णित किया गया है और कहा गया है कि श्री पहिला के लिए राजा धांगा के मन में बड़ी श्रद्धा थी।
सबसे पहिले श्री आदिनाथ जी की मूर्ति प्रतिष्ठापित की गयी। मगर १८५२ में जब ब्रिटिश पुरातात्विक सर्वेक्षणकर्ता अलेक्जेंडर कनिंघम ने दौरा किया, तो उन्होंने मुख्य गर्भगृह को निर्जन पाया, वहा मूर्ति नहीं थी !
उन्होंने इतिहास में इसका नाम जिनानाथ मंदिर दर्ज किया और लिखा के सन १८५२ में एक जैन बैंकर ने मरम्मत का काम किया है। सन १८६० में, मुख्य गर्भगृह में एक पार्श्वनाथ मूर्ति स्थापित की गई थी।
एक आदिनाथ प्रतिमा को मंदिर में बाद में बनाये हुए एक दुय्यम मंदिर में रखा गया था।
मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
कला और वास्तुकला:
खजुराहो के जैन मंदिरो में पार्स्वनाथ मंदिर सबसे बड़ा है।
इसमें एक प्रवेश द्वार का बरामदा, एक छोटा हॉल, एक बड़ा मंडप, एक बरोठा, और एक पवित्र स्थान है।
मंदिर की संरचना में दो छोरों पर प्रक्षेपण के साथ एक आयताकार स्थापत्य रचना है।
सामने का (पूर्वी दिशा का) प्रक्षेपण, प्रवेश द्वार के बरामदे का दर्शन कराता है, तो पिछवाड़े में (पश्चिमी दिशा में) प्रक्षेपण एक मंदिर दिखाता है जो गर्भगृह से जुड़ा हुआ है।
प्रवेश द्वार के बरामदे की छत में चेन और फूल के पैटर्न है और एक दूसरे से लिपटे हुए उड़ते हुए अलौकिक जादूगर विद्याधर की एक जोड़ी है।
मंडप के द्वार-सरदल में आदिनाथ के परिचारक की मूर्ति है जो गरुड़ पर सवार दस-सशस्त्र चक्रेश्वरी (रिशंभनाथ की यक्षिणी) की है ।
VILAS
गर्भगृह में जीना की मूर्तियां भी हैं, जिसे अरिहंत के नाम से भी जाना जाता है।
बाहरी दीवारों में तीन मूर्तियां हैं। इन मूर्तियों में सुरसुंदरियाँ (सुंदर महिलाएं), उड़ने वाले जोड़े, नर्तक, संगीतकार और आकाशीय जीव हैं।
मंदिर पर जैन प्रभाव के बावजूद, बाहरी दीवारें भी वैष्णव विषयों को चित्रित करती हैं, जिनमें हिंदू देवताओं की मूर्तियां और उनके पत्नीके साथ अवतार शामिल हैं।
इन दीवारों पर विष्णु-लक्ष्मी, राम-सीता, बलराम-रेवती, परशुराम, हनुमान, ब्रह्मा और कृष्ण की पौराणिक कथाएँ खुदी हुई हैं।
ये मूर्तियां लक्ष्मण मंदिर के समान हैं जो मॉडलिंग, आनुपातिक और संतुलन के दृष्टिकोण से बेहद खूबसूरत हैं।
लक्ष्मण मंदिर के विपरीत, पार्श्वनाथ मंदिर में स्पष्ट रूप से कामुक मूर्तियां नहीं हैं ।
VILAS
V वाVILAS
8796212032
कहा जाता है के साल ९५० से लेकर साल ९७० तक प्रसिद्ध जैन कुटुंब ने इसकी निर्मिति की थी।
मंदिर के बाएं दरवाज़े पर जांब (जांब शब्द-फ्रेंच के जंबे से आता है) वास्तुकला में, एक चौखट या अन्य छेद का साइड-पोस्ट या अस्तर है, साथ ही उपहारों और बगीचों के धर्मादा के बारे में शिलालेख खुदी हुई है।
बगीचों के नाम पहिला वाटिका, चंद्र वाटिका, लघुचंद्र-वाटिका, शंकर-वाटिका, पञ्चैताला-वाटिका, आम्रा-वाटिका और धांगा-वाड़ी है।
शिलालेख में श्री पहिला को श्री जिनानाथ के भक्त के रूप में वर्णित किया गया है और कहा गया है कि श्री पहिला के लिए राजा धांगा के मन में बड़ी श्रद्धा थी।
सबसे पहिले श्री आदिनाथ जी की मूर्ति प्रतिष्ठापित की गयी। मगर १८५२ में जब ब्रिटिश पुरातात्विक सर्वेक्षणकर्ता अलेक्जेंडर कनिंघम ने दौरा किया, तो उन्होंने मुख्य गर्भगृह को निर्जन पाया, वहा मूर्ति नहीं थी !
उन्होंने इतिहास में इसका नाम जिनानाथ मंदिर दर्ज किया और लिखा के सन १८५२ में एक जैन बैंकर ने मरम्मत का काम किया है। सन १८६० में, मुख्य गर्भगृह में एक पार्श्वनाथ मूर्ति स्थापित की गई थी।
एक आदिनाथ प्रतिमा को मंदिर में बाद में बनाये हुए एक दुय्यम मंदिर में रखा गया था।
मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
कला और वास्तुकला:
खजुराहो के जैन मंदिरो में पार्स्वनाथ मंदिर सबसे बड़ा है।
इसमें एक प्रवेश द्वार का बरामदा, एक छोटा हॉल, एक बड़ा मंडप, एक बरोठा, और एक पवित्र स्थान है।
मंदिर की संरचना में दो छोरों पर प्रक्षेपण के साथ एक आयताकार स्थापत्य रचना है।
सामने का (पूर्वी दिशा का) प्रक्षेपण, प्रवेश द्वार के बरामदे का दर्शन कराता है, तो पिछवाड़े में (पश्चिमी दिशा में) प्रक्षेपण एक मंदिर दिखाता है जो गर्भगृह से जुड़ा हुआ है।
प्रवेश द्वार के बरामदे की छत में चेन और फूल के पैटर्न है और एक दूसरे से लिपटे हुए उड़ते हुए अलौकिक जादूगर विद्याधर की एक जोड़ी है।
मंडप के द्वार-सरदल में आदिनाथ के परिचारक की मूर्ति है जो गरुड़ पर सवार दस-सशस्त्र चक्रेश्वरी (रिशंभनाथ की यक्षिणी) की है ।
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गर्भगृह में जीना की मूर्तियां भी हैं, जिसे अरिहंत के नाम से भी जाना जाता है।
बाहरी दीवारों में तीन मूर्तियां हैं। इन मूर्तियों में सुरसुंदरियाँ (सुंदर महिलाएं), उड़ने वाले जोड़े, नर्तक, संगीतकार और आकाशीय जीव हैं।
मंदिर पर जैन प्रभाव के बावजूद, बाहरी दीवारें भी वैष्णव विषयों को चित्रित करती हैं, जिनमें हिंदू देवताओं की मूर्तियां और उनके पत्नीके साथ अवतार शामिल हैं।इन दीवारों पर विष्णु-लक्ष्मी, राम-सीता, बलराम-रेवती, परशुराम, हनुमान, ब्रह्मा और कृष्ण की पौराणिक कथाएँ खुदी हुई हैं।
ये मूर्तियां लक्ष्मण मंदिर के समान हैं जो मॉडलिंग, आनुपातिक और संतुलन के दृष्टिकोण से बेहद खूबसूरत हैं।
लक्ष्मण मंदिर के विपरीत, पार्श्वनाथ मंदिर में स्पष्ट रूप से कामुक मूर्तियां नहीं हैं ।
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जेजाकभुक्ति के राजा
भगवान आदिनाथ




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