पूर्वोत्तर राज्य में, आसाम के दीमा हसाओ जिले में स्थित एक परबत की चोटी पर बसा जतिंगा नामक गांव है जो गुवाहाटी की दक्षिण की और ३३० किमी पर है। यह जगह हमारे देश में विचित्र घटना के लिए काफी प्रसिद्ध या यु कहो बदनाम हुई है!
इस घटना को पक्षी की मृत्यु के लिए छलांग कहा जाता है। हम इसे पक्षियों की सामूहिक आत्महत्या भी कह सकते है !! आइये जानते है क्यों?
जतिंगा शहर की लोकसंख्या ३००० से भी कम है।
भारत के सबसे प्रतिष्ठित पक्षीविज्ञानियों द्वारा किए गए अध्ययनों के बावजूद, पक्षियों की मौत का यह विचित्र सिलसिला बरम्यूडा के रहस्य समान है।
असल में ये पक्षी आकाश में हुए अचानक बदलाव से घबरा जाते है, जिनमे ज्यादातर बच्चे शामिल होते है। गांव की रौशनी को, तथा गाववालो के जलाये हुए मशाल को सहारा मान कर उसकी ओर छलांग लगाते है और गांववाले उनकी हत्या करते है! या वे जमीनपर पटक कर मर जाते है |
हम इसे आत्महत्या तो नहीं कह सकते !
मगर गांव वाले इसे आकाश से उतरी हुई उड़ने वाली बुरी आत्माये मानकर इन पक्षियों को मारते है !
इस इलाके में हर साल यह दोहराती अनहोनी घटना घटती है, फिर भी आसपास के २०० मिटर की दुरी से यह विविध पक्षी यहाँ के १५० मीटर जितने क्षेत्र में मौत की छलांग लगाने आते है।
इस अजीबो-गरीब घटना का असर किसी खास प्रकार के पक्षी तक सिमित नहीं बल्कि यहाँ दूर से आते सैलानी पक्षी भी जैसे के टाइगर बिटर्न, काले बिटर्न, नन्हे इग्रेट, तालाब के बगुला, भारतीय पित्ता, पहाड़ी दलिया, हरे रंग के कबूतर,पन्ना कबूतर,बिना गर्दन वाली लॉफिंगथ्रश,काला ड्रोंगो और किंगफिशर जैसे सभी पक्षी इस अनहोनी घटना का शिकार होते है!
असम के सबसे प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी श्री अनवरुद्दीन चौधुरी का मानना है की इनमे अधिकतर कम उम्र के बच्चे होते है, जिनके लिए वातावरण होने वाला अचानक बदलाव एक नया मगर बहुत ही खौफनाक, डरावना अनुभव है, जिससे भयभीत होकर वे अपनी जान बचाने के लिए इंसानी बस्ती की और से आती रौशनी को सहारा मानकर उसकी तरफ छलांग लगाते है और इस घटना का गलत फायदा ग्रामवासी उठाते हुए उनका शिकार करते है, या यह पंछी जमी पर पटक कर मर जाते है !!।
है न हैरानी की और दुःख भरी बात!
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| टाइगर बिटर्न |
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| काले बिटर्न |
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| तालाब के बगुला |
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| नन्हे इग्रेट |
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| पहाड़ी दलिया |
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| हरा कबूतर |
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| भारतीय पित्ता |
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| पन्ना कबूतर |
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| बिना गर्दन वाली लॉफिंगथ्रश |
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| किंगफिशर |
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| काला ड्रोंगो |
| प्रकृतिवादी ई.पी. गी |
प्रकृतिवादी स्वर्गीय ई.पी. गी ने १९६० के दशक में इस घटना की ओर दुनिया का ध्यान खिंचा। वह प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी स्वर्गीय डॉ सलीम अली जी को अपने साथ जतिंगा लेकर गए।
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| डॉ सलीम अली |
एक अन्य सिद्धांत ये कहता है कि इस क्षेत्र का मौसम "भूमिगत जल के चुंबकीय गुणों में परिवर्तित" हो जाता है, जिससे पक्षियों की मानसिक स्थिति खराब हो जाती है।
भारत के प्राणी सर्वेक्षण मंडल के सदस्य श्री सुधीर सेनगुप्ता के मार्गदर्शन में पक्षियों की सामूहिक हत्याओं को रोकने के प्रयास में गाववालो को इस घटना के बारे में शिक्षित करने के लिए गांव गए।
तब से पक्षियों की मृत्यु में ४० प्रतिशत की कमी आई है। असम में सरकारी अधिकारी इस घटना का उपयोग पर्यटकों को छोटे शहर में आकर्षित करने के लिए करने का प्रयास कर रहे है।
श्री अनवरुद्दीन चौधुरी जी ने इस घटना का वर्णन करते हुए इसे मिजोरम, फिलीपीन्स और मलेशिया में घटित इसी तरह की विचित्र घटना के साथ तुलना करके अपनी किताब The Birds of Assam में इसका जिक्र किया है। (अनवरुद्दीन चौधरी, एम.ए., पीएचडी, डी.एससी, एक भारतीय प्रकृतिवादी हैं, जो उत्तर-पूर्वी भारत के जीवों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए विख्यात हैं।)
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| अनवरुद्दीन चौधरी |
भारत में पक्षी संरक्षण समूहों और वन्यजीव अधिकारियों ने अशिक्षित ग्रामीणों में जागरूकता पैदा करते हुए पूरे भारत में पक्षियों की हत्या को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए हैं।
दीमा हसाओ के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री बिकाश ब्रह्मा ने कहा कि पिछले कुछ सालों से गांव में आने वाले पक्षियों की संख्या और पक्षियों की हत्या की संख्या में कटौती होने लगी है।
















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