पर क्या आप जानते हैं की दुनिया भर मे कई ऐसी जगह हैं, जिसके बारे मे हमारी सोच काम करती नही, हमे विश्वास नही होता, और हम पूछते हैं :
क्या ऐसा भी होता हैं?
कई जगह ऐसी भी है जहा हमें पहुंचने के लिए जान की बाजी लगानी पड़ती है!
आज हम कुछ ऐसी ही जगहो के बारे मे जानते हैं, और इनमे कुछ जगह तो भारत मे भी है !
हमारे देश मे निसर्ग ने खुबसूरती अपने दोनो हाथो से बिखरायी हैं | जो सभी पर्यटको के लिये जीवन भर का रोमांचक अनुभव हैं |
इन जगहों पर हम आसानी से जा सकते है, मगर कुछ ऐसी भी जगह हैं जो काफी रहस्यमय हैं, खतरनाक है या हम इनसे बिलकुल अंजान है|
जिनकी कई दंतकथाये हैं |
ऐसी जगह या तो घने जंगलो मे होती हैं या ऐसी दुर्गम जगह मे, जहाँ आम इन्सान का जाना बेहद मुश्किल या नामूमकिन होता हैं | यह जगह हमे सही मायने मे डराती भी हैं, हमारे लिए विश्वास रखना ना-मुमकिन हो जाता हैं |
तो कुछ जगह ऐसी विस्मयजनक हैं जिसे देख हम अचंबित होते हैं, भोचक्के रह जाते है |
आईये आज हम जान लेते हैं, भारत के उत्तराखंड में स्थित एक झील के बारे में, जो कंकाल झील के नाम से प्रसिद्द है !
उत्तराखंड का कंकाल
वाला रुपकुंड झील :
समुन्दर तट से लगभग १६,५०० फिट उंचायी पर स्थित इस झील को रुपकुंड झील कहते हैं | इस झिल कि खासियत हैरान करने वाली है |
इस झील के किनारे तक़रीबन १२०० साल से ३०० कंकाल पडे हैं, जिसकी वजह से यह कंकाल वाला झील कहलाता है!
यह झील बर्फ से ढकी रहती हैं और इसमें बड़े पत्थर वाले ग्लेसीयर चारो और बिखरे हुए हैं | और इसी भौगोलिक स्थिती की वजह से लोगो से यह बात शायद इतने सालो से छुपी रही |
वैज्ञानिको का मानना हैं की यह ९वी शताब्दी के जनजाती के हैं |
अनुसंधान के मुताबिक कुछ पौराणिक तो कुछ दंतकथा एक घटना की ओर इशारा करती है, जहां ९वीं शताब्दी में इस इलाके में अचानक आयी खतरनाक ओलावृष्टि में कुछ लोगों का एक बडा समूह फ़स गया था और मारा गया था।
पहले ब्रिटिश यह सोचने लगे की दूसरे विश्व् विग्रह के दौरान जापान के सैनिको द्वारा किये गये हमले मे मारे गये लोगो कें यह कंकाल हैं। मगर कंकाल उनके आने के काल से भी शतकों साल पुराने साबित हुए |
जिस महिने मे बर्फ पिघलती हैं तब यह सारे कंकाल साफ दिखते हैं | कंकाल के अलावा लकड़ी की कलाकृतियाँ, रिंग, लोहे के भाले, चमड़े की चप्पलें और गहने आदी भी दिखायी देती हैं! हैरानी की बात यह है की लगभग १२०० साल बाद भी यह कंकाल और चीजे यही पड़ी रही है !
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रेडियोकार्बन एक्सेलेरेटर यूनिट में हड्डियों की रेडियोकार्बन डेटिंग करने पर पाया की मृत्यु की कालावधी सन ८५० से ८८० के बीच है|
साल २००३ मे नेशनल जियोग्राफी की एक टीम को कुछ हड्डीयो मे तो मांस, बाल, नाख़ून भी मिले, जो वाकई में
हैरानी की बात है ! इतने सालो तक मांस, नाख़ून और बाल टिके हुए है ! क्यूंकि हमारा शरीर नाशवंत होता है, हड्डी के सिवा कुछ भी बचता नहीं।
इस इलाके में इन कंकालों के सिवा, घर की आम चीजे नहीं पायी गयी, जिससे यह भी अनुमान लगाया जाता है की ये लोग यहाँ के रहिवासी नहीं हो सकते, लेकिन यात्री हो सकते हैं, जो किसी लम्बे सफर के लिए यहाँ से गुजर रहे थें।
यहा लगभग ३०० कंकाल पाये गये हैं | १९५० मे भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण की टीम ने यहा से कुछ कंकाल अधिक परिक्षण के लिए डेहराडून के मानव विज्ञान संग्रहालय में भेजे हैं |
यहाँ इनकी DNA की जाँच की गयी, जिससे ये साबित हुआ की ७०% लोग इराण से आये थे और बाकी के स्थानिक थे |
मगर दंतकथा कहती है की कंकाल कन्नौज के राजा, रानी तथा उनके परिवार के सदस्य और नौकर वर्ग के लोगो के थे, जो यहा से किसी यात्रास्थल के लिए गुजर रहे थे। जिनमे दो समुदाय थे, कुछ एक कुटुंब के थे तो बाकि के अलग थे, क्यूंकि वह ऊंचाई में थोड़े नाटे थे।
इनमे से ज्यादातर कंकाल की खोपडी पीछे से फटी हुई थी जो किसी शस्त्र के वार की वजह से नहीं मुमकिन है, ऐसा अनुमान लगाया जाता है |
हो सकता है की यहाँ ओले के तूफान से बचने के लिए आश्रय लेने की कोई सुविधा न मौजूद होने की वजह से यह लोग स्वबचाव के लिए जमीं पर ही लेटे हो और सर के पीछे ओले लगने से उनकी खोपड़ी पिछेसे फटी हो।
भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण की टीम के संशोधकों का अनुमान है की क्षतिग्रस्त खोपड़ी किसी गेंद जितने बड़े ओले की वजह से फटी हो।
लेकिन कुछ वैज्ञानिको को यह बात और भी भ्रमित करती है की चोट के निशान खोपड़ी के पिछले हिस्से के अलावा पुरे बदन पर और कही नहीं थे ! और ओले गिरे हो तो आदमी जान बचाने के लिए जमीन पर लेटकर अपने दोनों हाथो से सर के पिछले हिस्से को ढक देता है । उन्होंने ओले से बचने के लिए हाथ या बाहो का इस्तेमाल जरूर किया होगा, मगर हाथ या पीठ या शरीर के किसी अन्य भाग पर चोट के कोई निशान नहीं नजर आ रहे है।
इसके विपरीत, सर का पिछला हिस्सा, जो उसने दोनों हाथो से ढका होगा वही क्षतिग्रस्त है ! और वह भी सारे के सारे कंकाल में !!
इसलिए ओले वाली दुर्घटना को कोई समर्थन नहीं मिलता है। या ऐसी ही किसी और बदन पर दुसरे चोट जिससे हड्डी क्षतिग्रस्त करने वाली आसमानी दुर्घटना के ये सारे लोग शिकार हुए होंगे, इस बात पर भी सहमति नहीं हो पा रही है।
दूसरा सिद्धांत है सामूहिक हत्या ! मगर सभी के सभी को सर के पीछे से मारने की बात पर भी यकीन रखना मुश्किल है।
एक सत्य तो है की इनके मौत की सही सही वजह आज तक कोई नहीं जानता ।
इनकी मौत की वजह के अलावा १२०० साल तक इनके मांस, नाख़ून बाल आदि कैसे सुरक्षित रहे यह राज भी अब तक सुलझ नहीं पाया है।
और भी कई सवाल अनुत्तरित है, जैसे के १२ शतको तक यह कंकाल वहा कैसे पड़े रहे ?
क्यों अब तक किसीने उन्हें छुआ नहीं ? क्यों किसीने इन्हे यहा से हटाया नहीं ?
मगर, हाल ही में एक अजब घटना हुई ! कुछ सैलानी या उत्साही अभ्यासू इन कंकाल को खच्चर पर लाद कर ले गए थे !
इसलिए राज्य सरकार ने अब यह इलाका सील कर दिया हैं, क्यूँकी यह कंकाल एक संस्कृती के बारे मे, एक ऐतिहासिक पहेली के बारे में जानने के लिये बेहद उपयुक्त सबूत हैं | और उनकी मौत से जुड़े ऊपर दिए हुए सारे सवाल भी अनुत्तरित है।
©Vil®
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https://www.youtube.com/watch?v=8s_f0T_fuN4


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