Wednesday, October 27, 2021

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Wednesday, August 25, 2021

गुमनाम / बदनाम हैं कोई-भाग ११: मिस्ट्री हिल, लदाख

आम तौर पे कोई पर्बत से गिरा तो लुढ़कते लुढ़कते निचे गिर जाता है और मर जाता है, और अगर कोई चमत्कार हो तो गंभीर रूप से जख्मी हो जाता है, मगर बच जाता है । 

पर अगर मै आपको यह कह दू की लदाख में ऐसा पर्बत है जिसकी चोटी से आप अगर गाडी से निचे जाने की कोशिश करे तो, उसकी गाड़ी निचे जाने के बजाय ऊपर की ओर खींची चली जाती है !!!! 

खा गए झटका? ऐसी भी एक जगह है और वह भी हमारे भारत में!

इससे जुडे कुछ सिद्धांत दंतकथा में दबे है तो कुछ तार्किक है। 

दंतकथा में पौराणिक आधार पर यह माना जाता था की यहाँ से स्वर्ग को सिधा रास्ता जाता था। जिन्होंने जिंदगी में कोई गुनाह नही किया, वे अपने आप इस रास्ते से ऊपर स्वर्ग की ओर खींचे चले जाते थे और जो पापी है उन्हें ऊपर जाना मुमकिन नहीं था।  

दूसरा सिद्धांत बड़ा ही तार्किक या समझदार है जो काफी प्रसिद्द भी है। ऐसा माना जाता है की पर्बत के शिखर से चुम्बकीय किरणे निकलती है और उसका प्रभाव जितनी दूर फैलता है, अगर कोई वाहन उस दायरे में आ जाये तो वो शक्ति उसे ऊपर खिंच लेती है।

इस लेह-कारगिल महामार्ग से जितने दुनिया भर के सैलानी गुजरे है उन्हें इसका अनुभव हुआ है। बात यही तक नहीं रुकी, भारतीय वायु सेनाने किसी भी हवाई जहाज को इस इलाके से न गुजरने की ताकीद दी है, ताकि उन्हें किसी चुम्बकीय हस्तक्षेप का सामना न करना पड़े ! और कोई दुर्घटना न हो |

प्रकाशीय भ्रम सिद्धांत 

और एक सिद्धांत है जो इस चुम्बकीय ऊर्जा वाले सिद्धांत को मानता नहीं। यह सिद्धांत कहता है की यहाँ प्रकाशीय भ्रम सिद्धांत याने OPTICAL ILLUSION THEORY काम कर रही है। 

यहाँ लोगो को ऐसा भ्रम पैदा होता है कि सड़क, जो वास्तव में निचे कि और जाती है ऐसा भ्रमित करवाती है के वो नीचे की बजाय ऊपर कि और अपने आप जाती है। 

कुछ और घटनाये

ऐसे लोग हैं जो मानते हैं कि मैग्नेटिक हिल्स को ग्रेविटी हिल्स के रूप में जाना जाता है जिसे पूरी दुनिया में देखा जा सकता है। ग्रेविटी हिल्स के कुछ लोकप्रिय उदाहरण क्रमशः गुजरात में तुलसीश्याम, स्कॉटलैंड और चीन में इलेक्ट्रिक ब्रे और गांसु आदी हैं।

सरकारी अधिकारियों ने इस क्षेत्र में एक बैनर लगाया है, जहा से इस घटना को देखा जा सकता है। जिस जगह पर गाड़ी को न्यूट्रल में खड़ी करनी है उस जगह पर चिह्नित एक पीला बॉक्स किया गया है, उसमे सटीक बिंदु को अंकित किया है। वहां से इसे धीरे-धीरे पहाड़ी पर चढ़ते देखा जा सकता है। जबकि यह सड़क साल भर खुली रहती है, चुम्बकीय पर्बत की यात्रा का सबसे सही समय जुलाई और अक्टूबर के बीच है। इस दौरान सड़कें साफ रहती हैं और गाड़ी चलाने में कोई परेशानी नहीं होती है ।

यहाँ आने पर कुछ बातो का लोगो को ख्याल रखना होगा : चुम्बकीय पर्बत लेह से लगभग ३० किमी दूर, एक बंजर क्षेत्र का हिस्सा है। इसलिए चुम्बकीय करिश्मा देखने वाले सैलानी के अलावा और किसी हेतु के यहाँ कोई नहीं आता। जबकि आपको क्षेत्र में कुछ गिने चुने रहिवासी मिल सकते हैं।

लेह शहर में एक होटल में चेक-इन करने के बाद, इस चुम्बकीय पर्बत तक आने के लिए होशियारी इसीमे है की आप गाड़ी से आये। रास्ते मे आप को खाने की सुविधा नहीं मिलेगी, इस रहस्यमय पहाड़ी की यात्रा पर जाने के लिए आपको अपने लिये खाने का इंतजाम करना ही पड़ेगा।  

यहाँ जाने के लिए जो व्यवस्था है उनमे पहिली हवाई यात्रा है| यहाँ से ३ कि.मी. की दुरी पर लेह इंटरनेशनल एयरपोर्ट है और वहा से आप लदाख मैग्नेटिक हिल के लिए टेक्सी कर सकते है, जो लेह-कारगिल-बाल्टिक राष्ट्रीय महामार्ग पर स्थित है। 

दूसरा पर्याय कुछ लम्बा है, ७०० किमी दुरी पर जम्मूतवी रेलवे स्टेशन है, जो देश के सभी बड़े शहरो से रेल सेवा से जुड़ा है, आगे आपको फिर से टेक्सी करनी पड़ेगी। 

अगर रास्ते से जाना है तो मनाली-लेह हाइवे सबसे आरामदायक सफर होगा। यहाँ सरकारी सेवा वाली तथा प्रायवेट बसे भी जाती है।          

कुछ लोग मनाली से अपनी निजी गाड़ी से लेह जाना पसंद करते है जो अंतर ४९० किमी है।         

ऊपर दिए हुए सिद्धांतो के अलावा कोई अन्य सिद्धांत या मान्यता नहीं है जो इस राज का खुलासा कर सकती है। 

सरकारी सुचना

सिम्बायोसिस कौशल्य आणि व्यावसायिक विद्यापीठ के वर्गीस खान ने अपनी किताब The Truth Behind the Mysterious Magnetic Hill of Ladakh में लिखा है की यहाँ अगर अपनी गाड़ी न्यूट्रल में खड़ी करोगे तो गाड़ी अपने आप २० कि.मि. की रफ़्तार से ऊपर की और चढ़ती है !  

यहाँ टेक्सी ड्राइवर आते ही गाड़ी का इंजन बंद करता है ताकि सैलानी अपने आप चलती या ऊपर कि और खींचती जाती गाड़ी का रोमांचक अनुभव ले सके, जो उन्होंने अब तक सिर्फ सुना था। 

तंत्रिका विज्ञान में ऑप्टिकल भ्रम में ऐसी धारणा है; जिसका आम आदमी की भाषा में मतलब है कि आप या तो कुछ ऐसा देखते हैं जो वहां बिल्कुल नहीं है; या आप उन चीजों को उसके मूल रूप से विपरीत देखते हैं । इन ऑप्टिकल भ्रमों में से एक ग्रेविटी हिल है; जिसका अर्थ है कि एक बहुत ही मामूली उतरती ढलान दिखने मे ऊपर की ओर जाने वाली एक ढलान लगती है।  

यदि क्षितिज बाधित हो जाता है, तो हमारा मन भ्रमित हो जाता है और अक्सर चीजों को क्षैतिज या ऊर्ध्वाधर होने का अनुभव करा सकता है जबकि वे वास्तव में नहीं होते हैं। यह भ्रम काफी हद तक मून इल्यूजन के समान है; जहां चंद्रमा क्षितिज से बहुत बड़ा दिखता है।  

लद्दाख में हमारे मैग्नेटिक हिल पर भी यही अवधारणा लागू होती है। यह विशुद्ध रूप से एक प्राकृतिक ऑप्टिकल प्रभाव है जो क्षितिज को बाधित करने वाली पहाड़ियों के विशिष्ट लेआउट के कारण होता है। सड़क का वह छोटा सा हिस्सा जो वास्तव में ऊपर की ओर जाता हुआ प्रतीत होता है वह वास्तव मे ढलान पर है; और यही वजह है कि कारें धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ती हैं। इस खिंचाव पर आपकी आंखों के सामने की पहाड़ियों को स्वाभाविक रूप से इस तरह से रखा गया है कि वे आपके दिमाग को धोखा देंगी; और यह विश्वास करने के लिए कोशिश करेगी कि आप ऊपर जा रहे हैं। चूंकि आपकी आंखें क्षितिज को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकती हैं, इसलिए आपके मन के विरोधाभास का कोई रास्ता नहीं है।                   

      

Thursday, August 19, 2021

बाट दिया !!

बाट दिया सभी को मैने सुख का तालाब
अपनाया है मैने 2 तबसे दुःख का सैलाब ||

अपने पराये आते रहे 2
क्या दिया ये पूछते रहे 2
कैसे देदू खाली 2
इन हातो का हिसाब
बाट दिया सभी को... ||

कैसे मनाउ दिवाली 2
ये दिल हो गया खाली 2
दुवा का दिया लाया 2
अब तू रहना आबाद
बाट दिया सभी को...||

Wednesday, August 11, 2021

गुमनाम / बदनाम हैं कोई-भाग १०: जतिंगा-मौत की छलांग





पूर्वोत्तर राज्य में, आसाम के दीमा हसाओ जिले में स्थित एक परबत की चोटी पर बसा जतिंगा नामक  गांव है जो गुवाहाटी की दक्षिण की और ३३० किमी पर है। यह जगह हमारे देश में विचित्र घटना के लिए काफी प्रसिद्ध या यु कहो बदनाम हुई है! 

इस घटना को पक्षी की मृत्यु के लिए छलांग कहा जाता है। हम इसे पक्षियों की सामूहिक आत्महत्या भी कह सकते है !! आइये जानते है क्यों?

जतिंगा शहर की लोकसंख्या ३००० से भी कम है।  

भारत के सबसे प्रतिष्ठित पक्षीविज्ञानियों द्वारा किए गए अध्ययनों के बावजूद, पक्षियों की मौत का यह विचित्र सिलसिला बरम्यूडा के रहस्य समान है। 

मानसून के मौसम के बाद, आमतौर पर सितंबर और अक्टूबर में और केवल अंधेरी चांदनी रात होने पर, जतिंगा में पक्षियों की ४४ प्रजातियां अचानक शाम ६ से ९:३० बजे के बीच परेशान और बेचैन हो जाते हैं। अजीब तरह से विचलित होकर, पक्षी शहरों की मशालों और रोशनी की ओर छलांग लगाते हैं। इसे ग्रामस्थ लोग मृत्यु की उड़ान कहते है।   

असल में ये पक्षी आकाश में हुए अचानक बदलाव से घबरा जाते है, जिनमे ज्यादातर बच्चे शामिल होते है। गांव की रौशनी को, तथा गाववालो के जलाये हुए मशाल को सहारा मान कर उसकी ओर छलांग लगाते है और गांववाले उनकी हत्या करते है! या वे जमीनपर पटक कर मर जाते है |

हम इसे आत्महत्या तो नहीं कह सकते ! 

मगर गांव वाले इसे आकाश से उतरी हुई उड़ने वाली बुरी आत्माये मानकर इन पक्षियों को मारते है !   

इस इलाके में हर साल यह दोहराती अनहोनी घटना घटती है, फिर भी आसपास के २०० मिटर की दुरी से यह विविध पक्षी यहाँ के १५० मीटर जितने क्षेत्र में  मौत की छलांग लगाने आते है।

इस अजीबो-गरीब घटना का असर किसी खास प्रकार के पक्षी तक सिमित नहीं बल्कि यहाँ दूर से आते सैलानी पक्षी भी जैसे के टाइगर बिटर्न, काले बिटर्न, नन्हे इग्रेट, तालाब के बगुला, भारतीय पित्ता, पहाड़ी दलिया, हरे रंग के कबूतर,पन्ना कबूतर,बिना गर्दन वाली लॉफिंगथ्रश,काला ड्रोंगो और किंगफिशर जैसे सभी पक्षी इस अनहोनी घटना का शिकार होते है! 

असम के सबसे प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी श्री अनवरुद्दीन चौधुरी का मानना है की इनमे अधिकतर कम उम्र के बच्चे होते है, जिनके लिए वातावरण होने वाला अचानक बदलाव एक नया मगर बहुत ही खौफनाक, डरावना अनुभव है, जिससे भयभीत होकर वे  अपनी जान बचाने के लिए इंसानी बस्ती की और से आती रौशनी को सहारा मानकर  उसकी तरफ छलांग लगाते है और इस घटना का गलत फायदा ग्रामवासी उठाते हुए उनका शिकार करते है, या यह पंछी जमी पर पटक कर मर जाते है !!। 

है न हैरानी की और दुःख भरी बात! 

        टाइगर बिटर्न 
         काले बिटर्न
        तालाब के बगुला

       नन्हे इग्रेट

               पहाड़ी दलिया 
 
            हरा कबूतर

          भारतीय पित्ता
               पन्ना कबूतर
बिना गर्दन वाली लॉफिंगथ्रश

            किंगफिशर

           काला ड्रोंगो





प्रकृतिवादी ई.पी. गी 











प्रकृतिवादी स्वर्गीय ई.पी. गी ने १९६० के दशक में इस घटना की ओर दुनिया का ध्यान खिंचा। वह प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी स्वर्गीय डॉ सलीम अली जी को अपने साथ जतिंगा लेकर गए।                                                                                   

      डॉ सलीम अली
उनके अनुसार, इस घटना का कारण उस समय व्यापक कोहरे की विशेषता के कारण जमीन से काफी ऊंचाई पर उच्च गति वाली हवाओं में भटकाव होने की संभावना होती है।  

एक अन्य सिद्धांत ये कहता है कि इस क्षेत्र का मौसम "भूमिगत जल के चुंबकीय गुणों में परिवर्तित" हो जाता है, जिससे पक्षियों की मानसिक स्थिति खराब हो जाती है।

भारत के प्राणी सर्वेक्षण मंडल के सदस्य श्री सुधीर सेनगुप्ता के मार्गदर्शन में पक्षियों की सामूहिक हत्याओं को रोकने के प्रयास में गाववालो को इस घटना के बारे में शिक्षित करने के लिए गांव गए। 

तब से पक्षियों की मृत्यु में ४० प्रतिशत की कमी आई है। असम में सरकारी अधिकारी इस घटना का उपयोग पर्यटकों को छोटे शहर में आकर्षित करने के लिए करने का प्रयास कर रहे है। 

श्री अनवरुद्दीन चौधुरी जी ने इस घटना का वर्णन करते हुए इसे मिजोरम, फिलीपीन्स और मलेशिया में घटित इसी तरह की विचित्र घटना के साथ तुलना करके अपनी किताब The Birds of Assam में इसका जिक्र किया है। (अनवरुद्दीन चौधरी, एम.ए., पीएचडी, डी.एससी, एक भारतीय प्रकृतिवादी हैं, जो उत्तर-पूर्वी भारत के जीवों पर अपनी विशेषज्ञता के लिए विख्यात हैं।) 

  अनवरुद्दीन चौधरी
 उन्होंने अपनी खोज में पाया की ज्यादातर कम उम्र वाले पक्षी तथा नजदीक इलाके से वहा आते पक्षी, उनके घरोंदे पर होने वाले तेज गति की हवा के मार से हैरान और परेशां हो जाते है और इस स्थिति में कही शरण लेने के लिए गांव से दिखती रोशनी की ओर छलांग लगाते है। 
और गांव वाले उन्हें बांस के डंडे से मारते या घायल करते है।    

भारत में पक्षी संरक्षण समूहों और वन्यजीव अधिकारियों ने अशिक्षित ग्रामीणों में जागरूकता पैदा करते हुए पूरे भारत में पक्षियों की हत्या को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। 

दीमा हसाओ के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक श्री बिकाश ब्रह्मा ने कहा कि पिछले कुछ सालों से गांव में आने वाले पक्षियों की संख्या और पक्षियों की हत्या की संख्या में कटौती होने लगी है।  


Tuesday, August 10, 2021

तू दुखी है कहा sssss


 



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1. डिवोर्सी पति, पत्नी को :


तू दुखी है कहा sssss             

मै तो हसता यहाँ 

तेरे बिन मस्त मस्त

है दिल का जहाँ ।।

दुखी है कहा sss    

दुखी है कहा sss 

दुखी है कहा sss 

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गुमनाम / बदनाम हैं कोई-भाग ९:एक कंकाल झील

हमारी धरती बेहद सुंदर हैं, जिसमे ज्यादातर कुदरत का योगदान हैं, तो थोडा सा इन्सान का भी है|

पर क्या आप जानते हैं की दुनिया भर मे कई ऐसी जगह हैं, जिसके बारे मे हमारी सोच काम करती नही, हमे विश्वास नही होता, और हम पूछते हैं :
क्या ऐसा भी होता हैं? 
कई जगह ऐसी भी है जहा हमें पहुंचने के लिए जान की बाजी लगानी पड़ती है!
आज हम कुछ ऐसी ही जगहो के बारे मे जानते हैं, और इनमे कुछ जगह तो भारत मे भी है !

हमारे देश मे निसर्ग ने खुबसूरती अपने दोनो हाथो से बिखरायी हैं | जो सभी पर्यटको के लिये जीवन भर का रोमांचक अनुभव हैं |

इन जगहों पर हम आसानी से जा सकते है, मगर कुछ ऐसी भी जगह हैं जो काफी रहस्यमय हैं, खतरनाक है या हम इनसे बिलकुल अंजान है|
जिनकी कई दंतकथाये हैं | 
ऐसी जगह या तो घने जंगलो मे होती हैं या ऐसी दुर्गम जगह मे, जहाँ आम इन्सान का जाना बेहद मुश्किल या नामूमकिन होता हैं | यह जगह हमे सही मायने मे डराती भी हैं, हमारे लिए विश्वास रखना ना-मुमकिन हो जाता हैं |
तो कुछ जगह ऐसी विस्मयजनक हैं जिसे देख हम अचंबित होते हैं, भोचक्के रह जाते है |
आईये आज हम जान लेते हैं, भारत के उत्तराखंड में स्थित एक झील के बारे में, जो कंकाल झील के नाम से प्रसिद्द है !

                    उत्तराखंड का कंकाल                  
                     वाला रुपकुंड झील :

            








समुन्दर तट से लगभग १६,५०० फिट उंचायी पर स्थित इस झील को रुपकुंड झील कहते हैं | इस झिल कि खासियत हैरान करने वाली है |
इस झील के किनारे तक़रीबन १२०० साल से ३०० कंकाल पडे हैं, जिसकी वजह से यह कंकाल वाला झील कहलाता है!

यह झील बर्फ से ढकी रहती हैं और इसमें बड़े पत्थर वाले ग्लेसीयर चारो और बिखरे हुए हैं | और इसी भौगोलिक स्थिती की वजह से लोगो से यह बात शायद इतने सालो से छुपी रही |

वैज्ञानिको का मानना हैं की यह ९वी शताब्दी के जनजाती के हैं | 
अनुसंधान के मुताबिक कुछ पौराणिक तो कुछ दंतकथा एक घटना की ओर इशारा करती है, जहां ९वीं शताब्दी में इस इलाके में अचानक आयी खतरनाक ओलावृष्टि में कुछ लोगों का एक बडा समूह फ़स गया था और मारा गया था।
पहले ब्रिटिश यह सोचने लगे की दूसरे विश्व् विग्रह के दौरान जापान के सैनिको द्वारा किये गये हमले मे मारे गये लोगो कें यह कंकाल हैं। मगर कंकाल उनके आने के काल से भी शतकों साल पुराने साबित हुए |
जिस महिने मे बर्फ पिघलती हैं तब यह सारे कंकाल साफ दिखते हैं | कंकाल के अलावा लकड़ी की कलाकृतियाँ, रिंग, लोहे के भाले, चमड़े की चप्पलें और गहने आदी भी दिखायी देती हैं! हैरानी की बात यह है की लगभग १२०० साल बाद भी यह कंकाल और चीजे यही पड़ी रही है !

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रेडियोकार्बन एक्सेलेरेटर यूनिट में हड्डियों की रेडियोकार्बन डेटिंग करने पर पाया की मृत्यु की कालावधी सन ८५० से ८८० के बीच है|

साल २००३ मे नेशनल जियोग्राफी की एक टीम को कुछ हड्डीयो मे तो मांस, बाल, नाख़ून भी मिले, जो वाकई में  
हैरानी की बात है ! इतने सालो तक मांस, नाख़ून और बाल टिके हुए है ! क्यूंकि हमारा शरीर नाशवंत होता है, हड्डी के सिवा कुछ भी बचता नहीं। 

इस इलाके में इन कंकालों के सिवा, घर की आम चीजे नहीं पायी गयी, जिससे यह भी अनुमान लगाया जाता है की ये लोग यहाँ के रहिवासी नहीं हो सकते, लेकिन यात्री हो सकते हैं, जो किसी लम्बे सफर के लिए यहाँ से गुजर रहे थें। 

यहा लगभग ३०० कंकाल पाये गये हैं | १९५० मे भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण की टीम ने यहा से कुछ कंकाल अधिक परिक्षण के लिए डेहराडून के मानव विज्ञान संग्रहालय में भेजे हैं | 
यहाँ इनकी DNA की जाँच की गयी, जिससे ये साबित हुआ की ७०% लोग इराण से आये थे और बाकी के स्थानिक थे |

मगर दंतकथा कहती है की कंकाल कन्नौज के राजा, रानी तथा उनके परिवार के सदस्य और नौकर वर्ग के लोगो के थे, जो यहा से किसी यात्रास्थल के लिए गुजर रहे थे। जिनमे दो समुदाय थे, कुछ एक कुटुंब के थे तो बाकि के अलग थे, क्यूंकि वह ऊंचाई में थोड़े नाटे थे।  

इनमे से ज्यादातर कंकाल की खोपडी पीछे से फटी हुई थी जो किसी शस्त्र के वार की वजह से नहीं मुमकिन है, ऐसा अनुमान लगाया जाता है | 
हो सकता है की यहाँ ओले के तूफान से बचने के लिए आश्रय लेने की कोई सुविधा न मौजूद होने की वजह से यह लोग स्वबचाव के लिए जमीं पर ही लेटे हो और सर के पीछे ओले लगने से उनकी खोपड़ी पिछेसे फटी हो। 

भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण की टीम के संशोधकों का अनुमान है की क्षतिग्रस्त खोपड़ी  किसी गेंद जितने बड़े ओले की वजह से फटी हो।
 
लेकिन कुछ वैज्ञानिको को यह बात और भी भ्रमित करती है की चोट के निशान खोपड़ी के पिछले हिस्से के अलावा पुरे बदन पर और कही नहीं थे ! और ओले गिरे हो तो आदमी जान बचाने के लिए जमीन पर लेटकर अपने दोनों हाथो से सर के पिछले हिस्से को ढक देता है । उन्होंने ओले से बचने के लिए हाथ या बाहो का इस्तेमाल जरूर किया होगा, मगर हाथ या पीठ या शरीर के किसी अन्य भाग पर चोट के कोई निशान नहीं नजर आ रहे है। 
इसके विपरीत, सर का पिछला हिस्सा, जो उसने दोनों हाथो से ढका होगा वही क्षतिग्रस्त है ! और वह भी सारे के सारे कंकाल में !!

इसलिए ओले वाली दुर्घटना को कोई समर्थन नहीं मिलता है। या ऐसी ही किसी और बदन पर दुसरे चोट जिससे हड्डी क्षतिग्रस्त करने वाली आसमानी दुर्घटना के ये सारे लोग शिकार हुए होंगे, इस बात पर भी सहमति नहीं हो पा रही है। 
दूसरा सिद्धांत है सामूहिक हत्या ! मगर सभी के सभी को सर के पीछे से मारने की बात पर भी यकीन रखना मुश्किल है। 
एक सत्य तो है की इनके मौत की सही सही वजह आज तक कोई नहीं जानता ।
इनकी मौत की वजह के अलावा १२०० साल तक इनके मांस, नाख़ून बाल आदि कैसे सुरक्षित रहे यह राज भी अब तक सुलझ नहीं पाया है। 
 
और भी कई सवाल अनुत्तरित है, जैसे के १२ शतको तक यह कंकाल वहा कैसे पड़े रहे ?  
क्यों अब तक किसीने उन्हें छुआ नहीं ? क्यों किसीने इन्हे यहा से हटाया नहीं ?     
 
मगर, हाल ही में एक अजब घटना हुई ! कुछ सैलानी या उत्साही अभ्यासू इन कंकाल को खच्चर पर लाद कर ले गए थे !

इसलिए राज्य सरकार ने अब यह इलाका सील कर दिया हैं, क्यूँकी यह कंकाल एक संस्कृती के बारे मे, एक ऐतिहासिक पहेली के बारे में जानने के लिये बेहद उपयुक्त सबूत हैं | और उनकी मौत से जुड़े ऊपर दिए हुए सारे सवाल भी अनुत्तरित है। 

©Vil®
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https://www.youtube.com/watch?v=8s_f0T_fuN4 




Wednesday, August 4, 2021

ब्रिहदीश्वर मंदिर / पेरुवुदैयार कोविल

ब्रिहदीश्वर मंदिर चेन्नई के दक्षिण-पश्चिम में लगभग ३५० किलोमीटर दुरी पर तंजावुर शहर में स्थित है। जिसे पेरुवुदैयार कोविल भी कहा जाता है।तो कुछ लोग इसे दक्षिणा मेरु नाम से जानते है। 

यह मंदिर कावेरी नदी के दक्षिण तट पर स्थित शिव को समर्पित राजराजेश्वरम हिंदू मंदिर है।  

यहाँ जाने के लिए भारतीय रेलवे, तमिलनाडु बस सेवाओं और राष्ट्रीय राजमार्ग ६७, ४५सी, २२६ और २२६ एक्सटेंशन से जा सकते है। साथ ही तिरुचिरापल्ली अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा यहा से लगभग ५५ किलोमीटर दूर है। 

           मंदिर का मानचित्र  
                   एरिअल व्यू 


                  

रचना :

ब्रिहदीश्वर मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाइट नि‍र्मि‍त है। विश्व में यह अपनी तरह का पहला और एकमात्र मंदिर है जो कि ग्रेनाइट का बना हुआ है।

ब्रिहदीश्वर मंदिर अपनी भव्यता, वास्‍तुशिल्‍प और केन्द्रीय गुम्बद से लोगों को आकर्षित करता है। इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है।

मंदिर के ऊपर स्थित ग्रेनाइट की बनी हुई विमान मीनार दक्षिण भारत की सबसे ऊंची इमारतों में से एक है। मंदिर में एक विशाल गलियारा है और भारत में सबसे बड़े शिव लिंगों में से एक है। यह अपनी मूर्तिकला की उच्च गुणवत्ता के साथ-साथ ११ वीं शताब्दी में पीतल के नटराज - शिव को नृत्य के स्वामी के रूप में प्रसिद्ध है। 

आसपास के परिसर में नंदी, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश, सभापति, दक्षिणामूर्ति, चंदेश्वर, वराह और अन्य देवता के मंदिर शामिल हैं। 

इस मंदिर को देखने वाले पर्यटकों की संख्या भी तमिलनाडु में सबसे अधिक देखे जाने वाले मंदिरो की सूचि में एक है। 

दक्षिण भारत में बड़े मंदिरो में से यह एक है जिसकी शिल्पकला तमिल वास्तुकला पर आधारित है।

यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल का प्रतिक

इसका निर्माण तमिल के राजा चोल प्रथम द्वारा सन १००३ और १०१० के बीच निर्माण किया गया है, और यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल का एक हिस्सा है, जहा "महान जीवित चोल मंदिर" के रूप में इसे जाना जाता है।  

इस धरोहर स्थल में चोल राजवंश युग के गंगईकोंडा चोल पुरम मंदिर और ऐरावतेश्वर मंदिर भी शामिल है जो इसके उत्तर-पूर्व में क्रमशः ७० किलोमीटर और ४० किलोमीटर पर स्थित है।

      गंगईकोंडा चोल पुरम मंदिर प्रवेशद्वार

         ऐरावतेश्वर मंदिर
ईसमें गोपुर, मुख्य मंदिर, इसकी विशाल मीनार, शिलालेख, भित्ति चित्र और मूर्तियां मुख्य रूप से शैवीसम धर्म से संबंधित हैं, और इसमें वैष्णववाद और हिंदू धर्म की शक्तिवाद की परंपराएं भी शामिल हैं। 

                   शक्तिवाद के प्रतिक

(शक्तिवाद हिंदू धर्म की देवी-केंद्रित परंपरा है, जिसमें आध्यात्मिक वास्तविकता को रूपक रूप से एक महिला और शक्ति (महादेवी) माना जाता है। सर्वोच्च देव के रूप में माना जाता है। इसमें कई देवी-देवता शामिल हैं, सभी एक ही सर्वोच्च देवी के पहलू माने जाते हैं। शक्तिवाद की अलग-अलग उप-परंपराएं हैं, जिनमें दयालु पार्वती पर केंद्रित लोगों से लेकर भयंकर काली तक शामिल हैं।)

इतिहास :

चालुक्य युग के शासन में ५वीं से ९वीं शताब्दी तक हिंदू मंदिर शैलियों का एक वर्णक्रम विकसित होता रहा, जो हमें ऐहोल, बादामी और पट्टाडकल में भी नजर आता है, और फिर पल्लव युग में मामल्लापुरम और अन्य स्मारकों में भी इसकी झलक दिखाई देती है। इसके बाद, सन ८५० और १२८० के बीच चोल राजवंश के प्रमुख रूप में उभरा। इतिहास में इस मंदिर को तोडा गया था और कुछ कलाकृतिया गायब है। आगे चलकर मंदिर में कुछ मंडपम और स्मारक बनाये गए। १६ वि शताब्दी में इस मंदिर के आसपास किले की दीवारे बनाई गयी। 

प्रारंभिक चोल काल में उनकी सीमाओं को सुरक्षित करने और वास्तुकला पर कम जोर देने पर प्रयास हुआ। 

१०वीं शताब्दी में, चोल साम्राज्य के भीतर वर्गाकार आकर में राजधानियों के साथ बहुमुखी स्तंभ जैसी विशेषताएं पर जोर दिया गया। जो नई चोल शैली की शुरुआत का संकेत था। यह दक्षिण भारतीय शैली चोल राजा राजराजा प्रथम द्वारा सन १००३ और १०१० के बीच निर्मित ब्रिहदीश्वर मंदिर में विस्तार में और विस्तृत से, दोनों में पूरी तरह से परिपूर्ण हैं |

      राजा राजराजा प्रथम- ग्रेनाईट मूर्ती

         

           राजा राजराजा प्रथम

   मुख्य मंदिर और गोपुरम ११ वि सदी से पाए जाते है, और मंदिर में अगले १,००० वर्षों  में परिवर्धन, जीर्णोद्धार और मरम्मत होता रहा। मदुरै पर मुस्लिम कब्ज़ा करने की कोशिश में और तंजावुर को हिन्दू के कब्ज़ा करने की कोशिश में जितने आक्रमण और युद्ध हुए उसमे मंदिर का काफी हद तक नुकसान हुआ।   

जब जब हिन्दू राजवंशो द्वारा इस क्षेत्र पर जीत हासिल की तब तब इनकी मरम्मत की गई। कुछ मामलों में, शासकों ने पुराने के ऊपर नए भित्ति चित्रों चढ़ाकर, फीके चित्रों का जीर्णोद्धार करने का प्रयास किया। अन्य मामलों में, उन्होंने मंदिरों को जोड़ने का प्रयास किया। 

कार्तिकेय (मुरुगन), पार्वती (अम्मन) और नंदी के महत्वपूर्ण मंदिर १६ वीं और १७ वीं शताब्दी के नायक युग के हैं। इसी तरह दक्षिणामूर्ति मंदिर बाद में बनाया गया था। तंजौर के मराठों द्वारा इसका अच्छी तरह से रखरखाव किया गया था।

मंदिर का सकल रूप :

मंदिर का विस्तार पूर्व से पश्चिम २४०.७९ मीटर फैला है, और उत्तर से दक्षिण १२१.९२ मीटर। इस स्थान में पाँच मुख्य खंड हैं: ऊँची अधिरचना के साथ गर्भगृह (श्री विमान), सामने नंदी हॉल (नंदी-मंडपम) और इनके बीच में मुख्य सामुदायिक कक्ष (मुखमंडपम), महान सभा कक्ष (महामंडपम) और मंडप जो महान कक्ष को गर्भगृह (अर्धमंडपम) से जोड़ता है।  

मंदिर परिसर अपने विशाल प्रांगण में एक बड़े स्तंभ और ढके हुए बरामदे (प्राकार) को जोड़ता है, जिसकी परिधि लगभग ४५० मीटर (१,४८० फीट) है। इस स्तंभित बरामदे के बाहर घेरती हुई दो दीवारें हैं, बाहरी दिवार रक्षात्मक रूप में है और सन १७७७ में फ्रांसीसी औपनिवेशिक (फ्रेंच कॉलोनी) ताकतों द्वारा बन्दुक की नोक पर मंदिर को एक शस्त्रागार के रूप में इस्तेमाल किया गया। उन्होंने मंदिर परिसर क्षेत्र को अलग करते हुए बाहरी दीवार को ऊंचा बनाया। 

इसके पूर्वी छोर पर मूल मुख्य गोपुरम या प्रवेश द्वार है जो बैरल-वॉल्टेड (अर्ध गोलाकार) है। यह मुख्य मंदिर के विमान के आकार के आधे से भी कम है। ११ वीं शताब्दी के बाद मूल मंदिर में अतिरिक्त संरचनाएं जोड़ी गईं, जैसे कि इसके उत्तर-पूर्व कोने में एक मंडप और इसके परिधि पर अतिरिक्त गोपुरम (द्वार) लोगों को कई स्थानों से प्रवेश करने और बहार निकलने की जगह देते हैं।                                                                                                         

                 गोपुरम

फ्रँसीसी औपनिवेशिक युग शुरू होने से पहले पांड्या, नायक, विजयनगर और मराठा युग के दौरान इनमे कुछ मंदिरों और संरचनाओं को जोड़ा गया था, और इन बिल्डरों ने मूल योजनाओं और समरूपता नियमों का पालन किया था। मूल मंदिर प्रांगण के अंदर, मुख्य गर्भगृह और नंदी-मंडपम के साथ दो प्रमुख मंदिर हैं, एक कार्तिकेय के लिए और एक पार्वती के लिए। परिसर में अतिरिक्त छोटे मंदिर हैं। 

           ग्रेनाइट का नंदी

ब्रिहदीश्वर मंदिर ने स्थापत्य और सजावटी तत्वों को अपनाकर दक्षिण भारत की हिंदू मंदिर परंपराओं को जारी रखा, लेकिन इसका स्तर  ११ वीं शताब्दी से पहले बने मंदिरों से काफी अधिक था।             

चोल युग के आर्किटेक्ट्स और कारीगरों ने विशेष रूप से भारी पत्थर के साथ और ६३.४ मीटर (२०८ फीट) ऊंचे विशाल विमान को पूरा करने और निर्माण करने के लिए नवीनतम कलात्मक नैपुण्य का उपयोग किया।

इस प्रांगण के मध्य में मंदिर से संबंधित मुख्य स्मारक और विशाल मीनार है। मुख्य मंदिर के चारों ओर जो शिव को समर्पित है, छोटे मंदिर हैं, जिनमें से अधिकांश अक्षीय रूप से संरेखित हैं। ये उनकी पत्नी पार्वती, उनके पुत्रों सुब्रह्मण्य और गणेश, नंदी, वराही, करुवुर देव (राजराज चोल के गुरु), चंदेश्वर और नटराज को समर्पित हैं। नंदी मंडपम में गर्भगृह की ओर एक अखंड बैठा हुआ बैल है। उनके बीच में एक स्तंभित पोर्च और सामुदायिक सभा कक्ष की ओर जाने वाली सीढ़ियाँ हैं, फिर एक आंतरिक मंडप है जो प्रदक्षिणा पथ, या परिक्रमा पथ से जुड़ता है। मुख-मंडपम के सामने खड़े नंदी बैल का वजन लगभग २५ टन है। यह एक ही पत्थर से बना है और ऊंचाई में लगभग २ मीटर, लंबाई में ६ मीटर और चौड़ाई में २.५ मीटर है। नंदी की छवि एक अखंड है और देश में सबसे बड़ी में से एक है। 


      नंदी-मंडपम और गोपुरम प्रवेशद्वार
                  गर्भगृह और श्री-विमान

                 श्रीविमान 

गर्भगृह पश्चिमी वर्ग के मध्य में है। यह विशाल दीवारों से घिरा हुआ है जो गहरी खण्ड और खांचे प्रदान करने वाली तीक्ष्ण कटी हुई मूर्तियों और पायलस्टर द्वारा स्तरों में विभाजित हैं। 

(पायलस्टर : शास्त्रीय वास्तुकला में, एक पायलस्टर एक वास्तुशिल्प तत्व है जिसका उपयोग केवल एक सजावटी कार्य के साथ एक सहायक स्तंभ की उपस्थिति और दीवार की एक सीमा को स्पष्ट करने के लिए किया जाता है।)  

अभ्यारण्य के प्रत्येक किनारे में प्रतिमा के साथ एक खाड़ी है। गर्भगृह के आंतरिक भाग में एक विशाल पत्थर के लिंग के रूप में प्राथमिक देवता, शिव की एक छवि है। इसे करुवराई कहा जाता है, एक तमिल शब्द जिसका अर्थ है "गर्भ कक्ष"। इस स्थान को भारत के अन्य भागों में गर्भ गृह कहा जाता है। इस सबसे भीतरी कक्ष में केवल पुजारियों को प्रवेश करने की अनुमति है। 

द्रविड़ शैली में गर्भगृह लघु विमान का रूप धारण कर लेता है। इसकी भीतरी दीवार बाहरी दीवार के साथ मिलकर गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा के लिए एक मार्ग बनाती है। प्रवेश द्वार को अत्यधिक सजाया गया है। अंदर का कक्ष गर्भगृह है, जिसमें बृहद लिंग है। 

मुख्य विमान (शिखर) एक विशाल १६ मंजिला मीनार है जिसमें से १३ पतले वर्ग हैं। यह मुख्य चतुर्भुज पर हावी है। यह एक ३०.१८ मीटर (९९.० फीट) पक्षीय वर्ग के ऊपर बैठता है। टावर को पायलस्टर, पियर्स (एक उभरी हुई संरचना), और संलग्न स्तंभों के साथ विस्तृत रूप से व्यक्त किया गया है जो कि विमान की हर सतह को लयबद्ध रूप से कवर करते हैं। 

देवताओं और नाट्य शास्त्र नृत्य मुद्रा

चारो दिशामे अलग अलग देवता के मूर्तियों को आप देख सकते है :

पूर्व की दीवार: लिंगोद्भव, खड़े शिव, पाशुपत-मूर्ति, साथ ही अर्ध-मंडपम से मार्ग की ओर दो द्वारपाल;

दक्षिण दीवार: भिक्षाटन, वीरभद्र, दक्षिणामूर्ति, कलंतक, नटराज साथ मे दो द्वारपाल;

पश्चिम की दीवार: हरिहर (आधा शिव, आधा विष्णु), लिंगोद्भव, प्रभाववाली के बिना चंद्रशेखर, प्रभावली के साथ चंद्रशेखर, साथ मे दो द्वारपाल;

उत्तर की दीवार: अर्धनारीश्वर (आधे शिव, आधी पार्वती), बिना पार्वती के गंगाधारा, पाशुपत-मूर्ति, शिव-अलिंगन-मूर्ति, साथ मे दो द्वारपाल.

जगप्रसिद्ध पीतल की नटराज की मूर्ति 

दूसरी मंजिल पर, शिव के त्रिपुरांतक रूप को विभिन्न मुद्राओं में इन मूर्तियों के अनुरूप दर्शाया गया है। इन मंजिलों के ऊपर, तेरह मंजिलों (तलों) में ऊपर श्री-विमना मीनारें हैं। इन मंजिलों के ऊपर ग्रेनाइट का वजन ८० टन और ७.७७ मीटर (२५.५ फीट) की तरफ का एक वर्ग खंड है। इस ब्लॉक के शीर्ष पर, इसके कोनों पर लगभग १.९८ मीटर (६ फीट ६ इंच) गुणा १.६८ मीटर (५ फीट ६ इंच) आयाम में नंदी जोड़े हैं। 

इस ग्रेनाइट ब्लॉक के केंद्र के ऊपर तमिल हिंदू मंदिर वास्तुकला के ग्रीवा, शिखर और अंतिम (स्तूपी) हैं। यह स्तूप ३.८१ मीटर (१२.५  फीट) ऊंचा है, और मूल रूप से सोने से ढका हुआ था जो अब नहीं है। शीर्ष पर शिखर गुंबद के आकार का है और इसका वजन २५ टन है।  

इस मीनार की प्रत्येक मंजिल को कूट और शालाओं से सजाया गया है। इस मंदिर की सिकुड़ती चौकोर मीनार की वास्तुकला गंगईकोंडासोलिसवरम के चोल मंदिर की मीनार से भिन्न है, क्योंकि यह सीधे घुमावदार के विपरीत है।

मंदिर के श्री-विमना परिमाण ने इसे शहर के लिए एक विशाल मील का पत्थर बना दिया है। आदितला की ऊपरी मंजिला गलियारे की दीवार को नाट्य शास्त्र के १०८ नृत्य मुद्राओं में से ८१ के को कोरा गया है। यह पाठ तमिलनाडु के शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम का आधार है। २७ बिना प्रतिनिधित्व वाले मुद्रा पत्थर के खाली ब्लॉक हैं, और यह स्पष्ट नहीं है कि इन्हें क्यों नहीं तराशा गया। ८१ मुद्राएं तराशी गई हैं जो ११वीं शताब्दी की शुरुआत तक इस शास्त्रीय भारतीय नृत्य शैली के महत्व का सुझाव देती हैं।

गर्भगृह चौकोर है और एक चबूतरे पर विराजमान है जो ढाला गया है ०.५ मीटर जितना मोटा है। इसमें उपपीथम १४० सेमी और अधिष्ठानम ३६० सेमी के होते हैं।  

मंडप:

दो मंडप, अर्थात् महा-मंडप और मुख-मंडप, वर्गाकार योजना संरचनाएं हैं जो गर्भगृह और नंदी मंडप के बीच अक्षीय रूप से संरेखित हैं। महामंडप में प्रत्येक तरफ छह स्तंभ हैं। इसमें भी कलाकृति है। विटंकर और राजराजा प्रथम कांस्य में हैं, लेकिन इन्हें बहुत बाद में जोड़ा गया था। महामंडप दो विशाल पत्थर के द्वारपालों से घिरा है। यह सीढ़ियों द्वारा मुख-मंडप से जुड़ा हुआ है। मुख-मंडप के प्रवेश द्वार में भी द्वारपाल हैं। मंडप के साथ दिक्पालों के लिए आठ छोटे मंदिर हैं, या अग्नि, इंद्र, वरुण, कुबेर और अन्य जैसे प्रत्येक दिशा के संरक्षक देवता हैं। ये चोल राजा राजेंद्र के शासन के दौरान स्थापित किए गए थे। 

शिलालेखों से संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में चोल युग के दौरान प्रमुख हिंदू परंपराओं की अन्य प्रतिमाएं भी थीं, लेकिन अब यहाँ नहीं दीखते। मूल आठ मंदिरों में सूर्य (सूर्य देव), सप्तमातृका (सात माताएं), गणेश, कार्तिकेय, ज्येष्ठ, चंद्र (चंद्र देव), चंदेश्वर और भैरव शामिल थे। इसी तरह, पश्चिमी दीवार कक्ष में राजराजा प्रथम युग के दौरान निर्मित एक विशाल ग्रेनाइट गणेश था, लेकिन अब तिरूच-चुरु-मालिगाई (दक्षिणी बरामदा) में पाया जाता है। शक्तिवाद परंपरा की सात माताओं में से केवल वराही ही टूटे हुए रूप में जीवित रहती है। उसके अवशेष अब आंगन के दक्षिणी हिस्से में एक छोटे से आधुनिक युग की ईंट "वराही तीर्थ" में पाए जाते हैं। अन्य के मूल संस्करण उनके मूल चोल मंदिरों के साथ गायब हैं।

शिलालेख:

मंदिर की दीवारों पर तमिल और ग्रंथ लिपियों में कई शिलालेख हैं। इनमें से कई प्रथागत संस्कृत और तमिल भाषा के ऐतिहासिक परिचय से शुरू होते हैं, जिन्होंने इसे अधिकृत किया था, और उनमें से प्रमुख संख्या में मंदिर या मंदिर कर्मियों को, तो कुछ मामलों में शहर के निवासी को दिए जाने उपहारों पर चर्चा की जाती है। मंदिर परिसर में राजराजा चोल प्रथम के चौंसठ शिलालेख, राजेंद्र चोल प्रथम के उनतीस शिलालेख, विक्रमा चोल, कुलोत्तुंग प्रथम और राजेंद्रदेव (राजेंद्र चोल -द्वितीय) के प्रत्येकी एक शिलालेख हैं, एक संभावित पांडियन राजा के तीन, विजयनगर शासक अच्युतप्पा नायक और मल्लपा नायक के दो शिलालेख पाए जाते है।   

सहस्त्र कालीन स्मरणोत्सव

तंजावुर में राजा राजा चोल द्वारा वर्ष सन १०१० में निर्मित, मंदिर लोकप्रिय रूप से बड़े मंदिर के रूप में जाना जाता है। सितंबर २०१० में यह १००० साल का हो गया। भव्य संरचना के १००० वें वर्ष का जश्न मनाने के लिए, राज्य सरकार और शहर ने कई सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए। जब राजा राजा चोल (सन ९८५ से १०१४ तक ) ने विमान को ताज पहनाने के लिए, जो गर्भगृह के ऊपर ५९.८२ -मीटर लंबा मिनार है, अंतिम अभिषेक के लिए एक सोना चढ़ाया हुआ कलश सौंपा, वो उनके २५ वें शाही वर्ष (सन १०१०) के २७५ वें दिन को याद करने के लिए था। 

भरतनाट्यम यज्ञ:

इस अवसर के उपलक्ष में, राज्य सरकार ने प्रसिद्ध नर्तक पद्म सुब्रमण्यम के तहत एक भरतनाट्यम यज्ञ, शास्त्रीय नृत्य कार्यक्रम का आयोजन किया। यह संयुक्त रूप से एसोसिएशन ऑफ भरतनाट्यम आर्टिस्ट्स ऑफ इंडिया (ABHAI) और ब्राह्मण नाट्यंजलि ट्रस्ट, तंजावुर द्वारा आयोजित किया गया था। इमारत की १०००वीं वर्षगांठ के उपलक्ष में नई दिल्ली, मुंबई, पुणे, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, सिंगापुर, मलेशिया और अमेरिका के १००० नर्तकियों ने संगीत कार्यक्रम में दिव्य संगीत थिरुविसैप्पा (नौवां खंड) के रिकॉर्ड किए गए ११ छंदों पर नृत्य किया। थिरुमुरै करुवुर देव ( राजा चोल के गुरु) द्वारा रचित। २६ सितंबर २०१० से शुरू होने वाले दो दिनों के लिए छोटा शहर एक सांस्कृतिक केंद्र में बदल गया, क्योंकि पूरे शहर में सड़क पर प्रदर्शन करने वाले और नर्तकियों ने प्रदर्शन किया।

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Sunday, August 1, 2021

गॅलापागोस बेटे - निसर्गाने तयार केलेला खजिना - भाग ३ Galapagos Islands

                                                                                                                                                   भाग २ वरून


०) फर्नांडिना (नारबरो) बेट - 


कोलंबसच्या प्रवासाला प्रायोजक असलेल्या अरागॉनचा राजा फर्डिनांड २च्या सन्मानार्थ हे नाव देण्यात आले.

    राजा फर्डिनांड २ 

फर्नांडिनाचे क्षेत्रफळ ६४२ किमी स्क्वेयर आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची १,४९४ मीटर आहे. हे पश्चिम दिशेला असलेले  गॅलापागोस द्वीपसमूहाचे सर्वात तरुण बेट आहे. १३ मे २००५ रोजी, या बेटावर एक नवीन व अतिशय विस्फोटक प्रक्रिया सुरू झाली, जेव्हा राख आणि पाण्याचे वाष्प मेघ ७ किमी (२३,००० फूट) उंची वर गेले आणि लावा प्रवाह समुद्राच्या मार्गावर उतरला. 
                          पेलिकन
                
              गॅलापागोस पेंग्विन 







पुंटा एस्पिनोसा ही एक अरुंद जमीन आहे जिथे शेकडो समुद्री इगुआना जमा होतात,  मुख्यतः काळ्या लावा खडकांवर.  गॅलापागोस पेंग्विन, पेलिकन, गॅलापागोस समुद्री सिंह आणि गॅलापागोस फर सील यांच्याप्रमाणेच प्रसिद्ध कॉर्मोरंट्स, ज्यांना उडण्यासाठी पंख नाहीत, या बेटावर राहतात.  

  कॉर्मोरंट्स

वेगवेगळ्या प्रकारच्या लावा प्रवाहाची तुलना केली जाऊ शकते आणि खारफुटीची जंगले पाहिली जाऊ शकतात.  

११ ) पिन्झोन (डंकन) बेट

पिंझन बंधू, जे पिंटा आणि निना काफिल्याचे कर्णधार होते त्यांच्या नावावर हे बेट आहे. 

याचे क्षेत्रफळ १८ किमी स्क्वेयर आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची ४५८ मीटर (१,५०३ फूट) आहे.

पिन्झोन हे स्थानिक उप -प्रजाती चेलोनॉइडिस डंकेनेन्सिस, गॅलापागोस समुद्री सिंह आणि इतर स्थानिक प्रजातींच्या विशाल गॅलापागोस कासवांचे मूळ स्थान आहे. यात प्रवाश्यांसाठी सुविधा नाही आणि भेट देण्यासाठी परमिट देखील आवश्यक आहे.

पिन्झोन गॅलापागोस बेटांच्या केंद्रस्थानी आहे, परंतु दोन मुख्य  गॅलापागोस वृक्ष प्रजातींपैकी एकही इथे अस्तित्वात नाही. दमट क्षेत्रात डेझी झाडाची एक अनोखी प्रजाती आढळते. 

१२ ) पिंटा (लुईस) बेट

पिंटा काफल्याच्या नावावर असलेले हे बेट आहे व त्याचे क्षेत्रफळ ६० किमी स्क्वेयर (२३ चौरस मिल) आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची ७७७ मीटर (२,५४९ फूट) आहे. 

          पिंटा कासव / लोनसोम जॉर्ज 

इथे समुद्री सिंह, गॅलापागोस हॉक, महाकाय कासव, सागरी इगुआना आणि डॉल्फिन येथे आढळतातपिंटा कासव नामक प्रजातीचे हे शेवटचे राहण्याचे स्थान होते, ज्याला लोनसोम जॉर्ज म्हणतात. त्याला पिंटा बेटावरून सांताक्रूझ बेटावरील चार्ल्स डार्विन संशोधन केंद्रात हलवण्यात आले, जिथे शास्त्रज्ञांनी त्याच्यापासून प्रजनन करण्याचा प्रयत्न केला. तथापि, जून २०१२ मध्ये कोणत्याही संततीची निर्मिती न करता लोन्सम जॉर्जचा मृत्यू झाला.

ह्याचे नाव एका इंग्रजी उच्चभ्रू, लॉर्ड ह्यूग सेमोर यांच्या वरून देण्यात आले. ह्याचे एकूण क्षेत्रफळ १.९ किमी स्क्वेयर आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची २८ मीटर (९२ फूट) आहे. ह्या बेटावर निळ्या पायाचे बूबी आणि गिळण्या-शेपटीच्या गुलांची मोठी लोकसंख्या आहे. फ्रिगेट पक्ष्यांच्या सर्वात मोठ्या लोकसंख्येपैकी एक हे बेट आहे.

हे भूवैज्ञानिक उत्थानापासून तयार झालेले बेट आहे. 

                                                                                                              निळ्या पायाचे बूबी

  
               फ्रिगेट पक्षी


१३ ) वुल्फ (वेनमन) बेट
या बेटांचे नाव जर्मन भूवैज्ञानिक थिओडोर वुल्फ यांच्या नावावरून ठेवण्यात आले. त्याचे क्षेत्रफळ १.३ किमी स्क्वेयर आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची २५३ मीटर (८३० फूट) आहे. 

येथे फर सील, फ्रिगेटबर्ड्स, नाज्का आणि लाल पायांचे बूबीज, सागरी इगुआना, शार्क, व्हेल, डॉल्फिन आणि गिळलेल्या शेपटीचे गुल दिसू शकतात. सर्वात प्रसिद्ध रहिवासी म्हणजे व्हॅम्पायर फिंच, जो अंशतः इतर पक्षांच्या रक्तावर पोसतो आणि केवळ या बेटावर आढळतो. 

 
व्हॅम्पायर फिंच
                               



                                       Nacza
                                                                                              
लाल पायांचे बूबीज

१४ ) सांता फे (बॅरिंग्टन) बेट - 

स्पेनमधील एका शहराच्या नावावर ह्या बेटाचे नाव देण्यात आले. ह्याचे क्षेत्रफळ मात्र २४ किमी स्क्वेयर आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची   २५९ मीटर (८५० फूट) इतकी आहे. सांता फे मध्ये पालो सॅंटो आणि ओपंटिया कॅक्टसचे जंगलाचे साम्राज्य आहे, जे द्वीप समूहातील सर्वात मोठे आहेत. विथर्ड क्लिफ्स गिळण्या-शेपटीच्या गुल, लाल-बिलेदार उष्णकटिबंधीय पक्षी आणि शियर वॉटर पेट्रेलसाठी हे बेट वास्तव्यासाठी उत्तम जागा आहे. 
जमिनीच्या इगुआनांच्या सांता फे प्रजाती, तसेच लावा सरडे दिसतात. 

१५ ) रबिडा (जर्विस) बेट

हे रबिदाच्या आश्रमस्थान चे नाव आहे, जिथे कोलंबसने आपल्या मुलाला अमेरिकेच्या प्रवासा दरम्यान सोडले. त्याचे क्षेत्रफळ ४.९५ किमी स्क्वेयर आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची ३६७ मीटर (१,२०४ फूट) आहे. 
रबिडा येथील लाव्हामध्ये उच्च प्रमाणात लोह आहे ज्यामुळे त्याला एक विशिष्ट लाल रंग मिळतो. 
पांढऱ्या गालाचे पिंटेल बदके समुद्र किनाऱ्याजवळील खार्या पाण्याच्या सरोवरात राहतात, जिथे तपकिरी पेलिकन आणि बूबींनी इथे घरटे बांधली आहेत. हल्ली तर, सरोवरात फ्लेमिंगो देखील आढळले होते, परंतु ते नंतर इतर बेटांवर गेले आहेत, बहुधा रेबिडावर अन्नाचा अभाव हे कारण असू शकते. 
या बेटावर फिंचच्या नऊ प्रजाती आढळल्या आहेत. 

१६ ) सॅन क्रिस्टोबल (चॅथम) बेट - 

हे नाविकांच्या संरक्षक "सेंट क्रिस्टोफर" चे नाव आहे. त्याचे इंग्रजी नाव विल्यम पिट, चॅथम चे अर्ल प्रथम ह्यांच्यावर देण्यात आले. त्याचे क्षेत्रफळ ५५८ किमी स्क्वेयर आहे आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची ७३० मीटर (२,४००  फूट) पर्यंत आहे.  गॅलापागोस द्वीपसमूहातील हे पहिले बेट आहे. 
चार्ल्स डार्विनने बीगलवरील त्याच्या प्रवासादरम्यान भेट दिली. या बेटांवर फ्रिगेट पक्षी, समुद्री सिंह, महाकाय कासव, निळे आणि लाल पाय असलेले बूबीज, उष्णकटिबंधीय पक्षी, सागरी इगुआना, डॉल्फिन आणि निगल-शेपटीचे गुल आहेत. 

त्याच्या वनस्पतींमध्ये कॅलेंड्रिनिया गॅलापागोस, लेकोकार्पस डर्विनी आणि लिग्नम व्हिटे सारखी झाडे समाविष्ट आहेत. द्वीपसमूहातील सर्वात मोठे गोड्या पाण्यातील तलाव, लागुना एल जुन्को, सॅन क्रिस्टोबलच्या उंच प्रदेशात आहे. गॅलापागोस प्रांताची राजधानी प्यूर्टो बाकेरिझो मोरेनो आहे, जो बेटाच्या दक्षिण टोकावर आहे आणि सॅन क्रिस्टोबल विमानतळाच्या जवळ आहे.

१७ ) नॉर्थ सेमोर बेट - 

त्याचे नाव एका इंग्रजी उच्चभ्रू, लॉर्ड ह्यूग सीमोर यांच्यानंतर देण्यात आले. त्याचे क्षेत्रफळ १.९ किमी स्क्वेयर आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची २८ मीटर (९२ फूट) आहे. 
हे बेट निळ्या पायाचे बूबी आणि गिळण्या-शेपटीच्या गुलांची मोठी लोकसंख्या आहे. हे फ्रिगेट पक्ष्यांच्या सर्वात मोठ्या लोकसंख्येपैकी एक आहे. हे भूवैज्ञानिक उत्थानापासून तयार झाले आहे.
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ह्या शिवाय काही छोटे बेटे देखील आहेत :

१) डॅफने मेजर

सांताक्रूझच्या उत्तरेस आणि बाल्ट्राच्या थेट पश्चिमेस एक लहान बेट आहे, हे अत्यंत दुर्गम बेट अंब्रोस काउलीच्या १६८४ चार्टवर दिलेले असावे असे वाटते. पीटर आणि रोझमेरी ग्रांटच्या मल्टीडेकेड फिंच लोकसंख्येच्या अभ्यासाचे स्थान म्हणून हे महत्त्वाचे आहे.

२) दक्षिण प्लाझा बेट (प्लाझा सुर)

इक्वेडोरचे माजी अध्यक्ष जनरल लेनिदास प्लाझा यांच्या सन्मानार्थ ह्या बेटांचे नाव देण्यात आले आहे. त्याचे क्षेत्रफळ ० .१३ किमी स्क्वेयर आणि समुद्र सपाटी पासून कमाल उंची २३ मीटर (७५ फूट) आहे. 

दक्षिण प्लाझाच्या वनस्पतींमध्ये ओपंटिया कॅक्टस आणि सेसुवियम वनस्पतींचा समावेश आहे, जे लावा निर्मितीच्या वर लालसर कार्पेट तयार करतात. इगुआनास (जमीन, सागरी आणि दोन्ही प्रजातींचे काही संकर) मोठ्या प्रमाणात आढळत आहेत आणि बेटाच्या दक्षिणेकडील भागातील उंच कड्यावरून उष्णकटिबंधीय पक्षी आणि गिळलेल्या शेपटीसह मोठ्या संख्येने पक्षी उडताना दिसतात.
                      
ओपंटिया कॅक्टस          



                  
                   सेसुवियम वनस्पतीं
                                                                                                               

३ ) निनावी (नेमलेस) बेट - स्कूबा डायव्हिंगसाठी वापरले जाणारे एक लहान बेट.

४ ) रोका रेडोंडा - 

इसाबेलाच्या वायव्येस अंदाजे २५ किमी एक बेट. हर्मन मेलविले या द्वीपसमूहाचे वर्णन करण्यासाठी द एन्केन्टाडासचे तिसरे आणि चौथे स्केचेस (ज्याला तो "रॉक रोडोन्डो" म्हणतो). 


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