ओसीएन या ओसियन राजस्थान के जोधपुर जिलेमें एक ऐतिहासिक शहर है ।
यह नगर कैक तोडे गए हिंदू तथा जैन धर्म के भग्न मगर भव्य मंदिरों का समूह है।
यह समूह मंदिर आठवीं सदी से लेकर बारहवीं सदी तक बने थे।
गुर्जर प्रतिहरा वंशज के मारवार साम्राज्य मे ओसियन बहूत बड़ा धार्मिक क्षेत्र हुआ करता था।
यहा कुल १८ मंदिर है, जिनमे सूर्य साचिया माता मंदिर और भगवान महावीरजी को समर्पित मंदिर सौंदर्य और बेजोड़ वास्तुकला के लिये जगप्रसिद्ध है।
गुर्जर प्रतिहरा वंशज के मारवार साम्राज्य मे ओसियन बहूत बड़ा धार्मिक क्षेत्र हुआ करता था।
यहा कुल १८ मंदिर है, जिनमे सूर्य साचिया माता मंदिर और भगवान महावीरजी को समर्पित मंदिर सौंदर्य और बेजोड़ वास्तुकला के लिये जगप्रसिद्ध है।
सम्राट गुप्त के साम्राज्य मे यह एक बड़ा व्यापार केंद्र था।
कइ सदियों के लिये हिंदू तथा जैन धर्म का यह बड़ा धार्मिक केंद्र रहा था।
मगर ११९५ मे घोर के शासक मुहम्मद घोरी ने आक्रमण करके यहा की सारी संस्कृति को विध्वंस कर दिया।
सबूत बताते है की यहा सदियों पहले एक बडी वसाहत थी ।
काल के अनुरूप इनके नाम बदलते गए, जैसे के उपासिसाला, उकेसा, उपकेसापुर - पट्टाना आदि ।
इस वसाहत के प्रारम्भ काल मे ब्राह्मणो का प्रभाव था । तो गुप्त के शासन काल मे यह शहर ऊंट के कारवां के लिये विराम करने का ठिकाना बन गया था।
गुर्जर प्रतिहरा वंशज मे यह शहर एक प्रगतिशील केंद्र बन गया था। मगर जैसे जैसे समय बीतता गया लोग इस शहर को छोड़कर कही और रहने लगे ।
सन ९०० से ९५० तक उत्पलदेव ने इस शहर का पुनर्निर्माण किया। उत्पलदेव जैन धर्म से अधिक प्रभावित था, इसीलिये उसने जैन धर्म का अधिक प्रचार किया।
आगे चलकर यहा कुल १०० मंदिर बने !
महावीरजी के मंदिर मे एक दुसरे से लपेटे हुए सापों की प्रतिमाये दिखाई देती है जिन्हे ओस्वाल आधिस्ठत्याक देवता के रूप मे पूजा करते है । इस बातसे यह बात की पुष्टि होती है के यहा के निवासी के पूर्वज नागा वंश के थे।
मंडोर के राजा नरभट्ट के पुत्र नागभट्ट ने नागौर के करीब मेरता मे अपनी राजधानी बसाई, जिसका पुराना नाम नागपुरा था।
मंडोर के नागभट्ट-२ प्रतिहार शासक थे। ऐसा कहा जाता है के उन्होंने स्थानिक नागा लोगों को पराजित किया, जिसके लिये उन्हे नागभट्ट याने नागा लोगों का मालक कहा जाता है।
प्रतिहार ने यह इलाका नागा से जीत लिया, जैन धर्म के नागप्रियगच्चा मे इसी बात की पुष्टि की है।
शहर का अधिकतम नाश किया गया, मंदिरों को तोडा गया. इसके बाद नागरिक फिर वहां लौटे नहीं।
शक ७०५ याने सन ७८३ के जैन हरिवंश पुराण मे यह नमूद है की इस काल के वत्सराजा शासक पर उपकेसपुरा (ओसियन) का काफ़ी प्रभाव देखनेमें आया है, और विक्रम संवत १०१३ (सन ९५६) काल की पायी गयी लिखावट मे इसका जिक्र मिला है, साथ मे इस क्षेत्र का जिक्र भी मिला है।
V वा
8796212032






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