Sunday, August 30, 2020

विलुप्त जानवर - भाग २

https://youtu.be/QKEuXSsG9uA




How Do We Know What Color Dinosaurs Were | Latest Science News and Articles  | Discovery

Gigantic 500 kg dinosaur bone found in France, belongs to the world's  biggest dinosaur, France - Times of India Travel

डायनासोर का साढ़े छह करोड़ साल पहिले पतन होने के पूर्व तक़रीबन १४ करोड़ साल तक वे इस धरती पर राज कर रहे थे, ऐसा स्टडी में पता चला है।

उनके विलुप्त होने के लिए क्रीटेशस-तृतीयक कीं घटना (Cretaceous-Tertiary extinction event) मुख्य रूप से कारण  माना जाता है,  जिसे KT Event भी कहा जाता है।

अंतरिक्ष में अक्सर बडे पथ्थर, जिसे asteroids (हिंदी में क्षुद्रग्रह) कहा जाता है, किसी न किसी विस्फोट से तेज गति से सभी दिशा में फेंके जाते है, जो किसी सूर्य या उसके सौर मण्डल मे प्रवेश करके उनमे स्थित किसी ग्रह या उपग्रह से टकराते है। यह अवकाश में अक्सर घटित होता है। 

ऐसा ही एक काफी बड़ा क्षुद्रग्रह, साढ़े छह करोड़ साल पहले, आज जहा मेक्सिको गल्फ है वहा टकराया था ।
इसके टकराने का आघात हिरोशिमा तथा नागासकी पर गिराए गए अणुबम के आघात से लाखो गुना अधिक विनाशकारी था । 

इस आघात से कई स्तनधारि, उभयचर तथा सारे पेड, वृक्ष नष्ट हुए ।

पुरातत्व वैज्ञानिको का मानना है के इस टकराव से भूस्तर रचना और वातावरण में कई बदलाव हुए जिनकी वजह से डायनासोर के खानपान के चक्र में एक बहुत बड़ी खलल आयी, जिसकी वजह से उनका पतन हुआ।

२०% समुद्री जीवो का नाश हुआ तो ६०% पौधे ख़त्म हुए और ९८% गरम पानी के कोरल्स याने समुद्री मूंगा ख़त्म हुए। यह धरती पर मौजूद जीवो के पतन के लिए पर्याप्त कारण था, क्यूंकि निर्भरता का चक्र ही टूट गया, बिखर गया। जिसके चलते सो प्रतिशत डायनासोर्स का सर्वनाश हुआ । 

मगर १९८० के दशक में पिता-पुत्र वैज्ञानिक लुइस और वाल्टेर अलवारेझ ने यह पता लगाया की भू-वैज्ञानिक रिकॉर्ड के अनुसार इरीडियम की एक अलग परत पायी गयी, जो केवल अंतरिक्ष में पाया जाता है। उसके धरतीपर पटकने से डायनासोर का दुनिया भर में पतन हुआ।

उन्हें इरीडियम की परत, सम्भावना से सो गुना ज्यादा मात्रा में मिली। जिसकी वजह से यह पिता-पुत्र इस नतीजे पर आये की बड़ी मात्रा में एस्टेरॉइड्स धरती पर गिरे थे न के एक मात्र बड़ा एस्टेरॉइड्स! क्यूंकि अंतरिक्ष में पाए जाने वाले इरीडियम की मात्रा पृथ्वी के कई इलाके में उन्होंने खोज निकाली।

उनके मुताबिक एक धातु का एस्टेरोइड जो तक़रीबन १० किलोमीटर बड़ा था, उसके टकराने से १८ करोड़  मेगाटन TNT जितनी ऊर्जा पैदा हुई, जो व्यापक विनाश के लिए पर्याप्त थी। इसके टकराने का प्रहार ग्यारह भूकंप के झटके जितना जोरदार था।

यह एक गेम चेंजर था। 

१९९० के दशक में, वैज्ञानिकों ने मैक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप की नोक पर बड़े पैमाने पर चिकसुलूब क्रेटर- एक बड़े से गढ्ढे की खोज की, जिसका अस्तित्व इस  घटना के काल से रहा है।  

Walter Alvarez | American geologist | Britannica
Walter Alvarez 
इससे पता चलता है कि धूमकेतु, क्षुद्रग्रह या उल्का का पृथ्वीसे टकराना, डायनासोर के विलुप्त होने का कारण हो सकता है।

दूसरे शब्दों में KT Event  जैसी घटना का घटित होना प्रमाणित करता है।

  
Updated: Drilling of dinosaur-killing impact crater explains buried  circular hills | Science | AAAS
Chicxulub Crater

सिद्धांत तो कई है मगर, कोई सबूत नहीं है। 








कई जीवाश्म हड्डिया, दांत, पगडण्डी और कई ठोस सबुत यह दर्शाते है के यह धरती कम से कम १६ करोड़  साल के लिए डायनासोर की जागीर थी। मगर अभी तक छह करोड़ से भी ज्यादा साल के मौजूद पाषाण में इनके कोई सबुत नहीं मिले।

४.३ करोड़ साल पहले मौजूद क्रेटेशियस काल के रूप में पैलोजीन की जो उपज हुई, उस वक़्त सारे डायनासोर, खास करके जो उड़ नहीं सकते थे, एक साथ मारे गए।
Paleogene Period | geochronology | Britannica

पुरातत्वविज्ञानी के लिए एक एक कड़ी को मिलाना बड़ी ही चुनौती पूर्ण काम था। और इनके पतन के वजह के सिद्धांत का पता लगाना भी बेहद मुश्किल था।

फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय के भीतर दो विषयो पर मतान्तर है : क्या हिंसात्मक डायनासोर हिंसा के शिकार थे, या पृथ्वी पर मौजूद संकट या कोई अन्य घटित संकट इनके सर्वनाश की वजह थी ?  


कुछ वैज्ञानिको का मानना है के छोटे स्तनधारी जानवर डायनासोर के अंडे खा जाते थे जिससे धीरे-धीरे करके डायनासोर की प्रजाति लुप्त हुई।

दुसरे सिद्धांत के अनुसार बड़े डायनासोर का शरीर मोटा होते गया और इस मोटे शरीर का नियंत्रण उनके छोटे मस्तिष्क के लिए इतना कठिन होते गया के जिसके चलते इनका नामशेष होते गया।

तो कुछ वैज्ञानिक कहते है के किसी महामारी के चलते इनका सर्वनाश हुआ और बाकि जानवर, जो इनके मृत शरीर को खा गए, वह भी महामारी का शिकार बन गए।

और एक सिद्धांत कहता है के चूँकि बड़े डायनासोर बड़ी मात्रा में वनस्पति खाते थे, इस खाद्य के समाप्त होने से भूक से यह प्रजाति का अंत हुआ।

मगर इनमे से कई थियरी आसानी से अमान्य हुई :

अगर डायनासौर का मस्तिष्क वाकई में छोटा होता तो वे इतने करोडो साल नहीं जीते। साथ ही वनस्पति में ऐसी कोई बीमारी नहीं होती जिससे जानवर संक्रमित हो।

इसलिए सभी समकालीन जानवरो का एक साथ पतन होना या विलुप्त होना इन सिद्धांत को झुठलाता है। 

कई सालो के लिए वातावरण में बड़े पैमाने में हुए बदलाव की थियरी या सिद्धांत को ही माना जाता था।
डायनासोर हमेशा पृथ्वी के आर्द्र और उष्णकटिबंधीय वातावरण में जीते थे।

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लेकिन पुरातन काल के मेसोज़ोइक युग में, जो काल डायनासोर के विलुप्त होने से मेल खाता है, सबूत बताते हैं कि उस वक़्त हमारी पृथ्वी धीरे-धीरे ठण्ड होने लगी। जिसकी वजह से उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में बर्फ जमने लगी। इसके फलस्वरूप समुन्दर का पानी ठंडा होने लगा। और डायनासोर का शरीर तुलनामे ठण्ड था और सूरज की गर्मी पर निर्भर था, आसपास के बढ़ते ठण्ड माहौल का उनपर विपरीत परिणाम होने लगा। इनके मुकाबले में मगरमच्छ, जो ठन्डे खून का जिव था, जीवित रहे।

और जो वातावरण में परिवर्तन हो रहा था उस बदलाव को दसियों हज़ार साल लगे होंगे और इतना काल डायनासोर को बदलते वातावरण के अनुरूप होने के काफी था।

क्या यह दूसरे वायुमंडल से आया था ?

१९८० के दशक में पिता-पुत्र वैज्ञानिक लुइस और वाल्टेर अलवारेझ वैज्ञानिकों ने इस धारणा का प्रस्ताव दिया कि छह करोड़ साठ लाख साल पहले एक उल्का पिंड, जो एक बड़े परबत के आकार का था, पृथ्वी पर टकराया, जिससे वायुमंडल गैस, धूल और मलबे से भर गया, जिसने जलवायु को बहुत बदल दिया। इसे अलवारेझ परिकल्पना भी कहते है।

Dinosaur-Killing Impact May Have Superheated Earth's Atmosphere for 100,000  Years - ExtremeTech

इसके सबुत के तौर में एक प्रमुख टुकड़े में धातु इरिडियम की एक अजीबसी और उच्च मात्रा में मौजूदगी पाई गयी, जिसे क्रेटेशियस-पेलोजीन, या के-पीजी परत के रूप में जाना जाता है।

यह के-पीजी वो भूगर्भीय सीमा क्षेत्र है जिस की परत में डायनासोर जीवाश्म पाया जाता हैं।

वैसे तो इरिडियम पृथ्वी की पपड़ी में अपेक्षा के विपरीत दुर्लभ पाया गया है, मगर पथरीले उल्कापिंडों में यह कई गुना मात्रा में है, जिसके कारण अल्वारेज़ ने निष्कर्ष निकाला कि यह दूसरे ग्रहो से या दुनिया से आये हुई कोई चीज जैसे उल्कापिंड आदि, इन डायनासौर के विनाश का कारण बना होगा।

मेक्सिको के युकाटन प्रायद्वीप के तट के साथ वैज्ञानिकों ने डायनासोर का विलुप्त होने की घटना को एक विशाल प्रभाव गड्ढे याने क्रेटर से जोड़ने में सक्षम होने पर सिद्धांत को और अधिक आधार मिला।

Russian astronomer Joseph Shklovsky 

दूसरे अध्ययन में १९५६ में, रूसी खगोल विज्ञानी जोसेफ श्लोकोव्स्की (१९१६-८५) पहले वैज्ञानिक थे, जिन्होंने विलुप्त होने का कारण एक एकल भयावह घटना को माना और उन्होंने यह सिद्ध किया कि एक सुपरनोवा (एक मरने वाले तारे का विस्फोट) ने पृथ्वी पर विकिरण का वर्षाव किया, जिसकी वजह से डायनासोर मारे गए होंगे। मगर यहाँ एक और सवाल पैदा होता है की सिर्फ डायनासोर क्यों मरे ?

साथ ही, वैज्ञानिकों ने कहा कि इस तरह की घटना ने पृथ्वी की सतह पर सबूत छोड़े होंगे- जैसे क्रेटेशियस काल की विकिरण की मात्रा। मगर ऐसा कुछ नहीं मिला।

मगर १९९१ में जो युकाटन प्रायद्वीप में चिकक्सुलब क्रेटर पाया गया वह इस थियरी को प्रमाणित करता है के छह माइल व्यास वाला टूटता तारा जो यहाँ टकराया था उसने बड़े पैमाने पर विनाशकारी प्रलय पैदा किया होगा।

इसकी रफ़्तार प्रति घंटा ४०,००० माइल थी, जिसके टकराने से आज के अणुबम के मुकाबले बीस लाख गुना अधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा हुई, जो बड़ी मात्रा में सर्वनाश की वजह बन सकती है।

इतनी भीषण गर्मी ने पृथ्वी की सतह को तोड़ दिया होगा, दुनिया भर के जंगल को जला दिया होगा और वातावरण को मलबे के रूप में ढाल कर धरती को अंधेरे में डुबो दिया होगा।
 
महा विनाशी कम्पन ने मीलों ऊँची त्सुनामी पैदा की होगी, जिसने पृथ्वी पर रहते सारे जीवों को भक्ष करते हुए महाद्वीपों को डुबो दिया। सदमे की लहरों ने भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट शुरू कर दिए।

इसके परिणाम स्वरुप महीनो तक दुनिया में अंधेर छा गया। जिसकी वजह से पृथ्वी का तापमान शून्य तक आ गया। वनस्पति श्रुष्टि का खात्मा हुआ, जिसके चलते उस पर आश्रित सारे जिव धीरे धीरे भूक से मरने लगे।
हफ्ते भर में कई डायनासोर मरने लगे। मांसाहारी पशु जो शाकाहारी पर निर्भर थे वह भी महीने-दो महिनो मे भूक के मारे मरने लगे। 

कुल मिलाकर, जैव विविधता का बड़े पैमाने पर होने वाला नुकसान सभी जीवो के लिए जानलेवा हो गया। सिर्फ छोटे जिव जंतु जो जमीन के निचे जाकर अपने आपको बचा सके, बच गए।

इरिडियम की परत और चीकुक्सबब क्रेटर, कई वैज्ञानिकों को यह समझाने के लिए पर्याप्त सबूत थे कि टूटते हुए तारे के आग के गोले का प्रभाव वाला सिद्धांत विश्वसनीय था। इरिडियम की परत और चीकुक्सबब क्रेटर वैज्ञानिकों को यह समझाने के लिए पर्याप्त सबूत था कि बोल्ट प्रभाव सिद्धांत विश्वसनीय है। और यह सिद्धांत बाकि सिद्धांतको झुठलाता है।

फिर भी यह सिद्धांत मात्र है !

डायनासोर के विलुप्त होने पर वैज्ञानिको का एकमत नहीं है, और जिस तरह जीवाश्म पाए जाते हैं, वो डायनासोर के जीवित और मर जाने के बारे में जानकारी बताते हैं।

हाल ही में पक्षियों को डायनासोर के वंशज के रूप में पहचाना गया है, और डायनासोर की बुद्धि और व्यवहार के बारे में सिद्धांत इन पक्षियो की वजह से बदलते रहते हैं। यही नहीं, जो मान्यता थी के डायनासोर ठण्ड खून के जिव थे, यह भी गलत साबित हो रही है।

पृथ्वी के जलवायु परिवर्तन का सिद्धांत अभी भी उन वैज्ञानिकों पर हावी है, जो इस बात का खंडन करते थे कि चिनक्सुलब प्रभाव डायनासोर के विलुप्त होने का एकमात्र कारण था।
भारत में साढ़े छह करोड़ साल पुराने लावा के प्रमाणों से संकेत मिलता है कि एक विशाल, गैसीय ज्वालामुखी के ढेर ने वैश्विक जलवायु परिवर्तन की शुरुआत की होगी, जिससे डायनासोरों को खतरा था।

वैज्ञानिकों के निरंतर शोध से कभी-बदलते, कभी विकसित होने वाले ग्रह की अधिक विस्तृत तस्वीर को चित्रित करने में मदद मिलेगी।

इस प्रागैतिहासिक रहस्य को जानने की कोशिश करने वाले वैज्ञानिक, इन विचारों का कॉम्बिनेशन होगा, यह मानते थे ।

यह संभव है कि डायनासोर के नसीब में एक भूगर्भिक पंच थे, ज्वालामुखी के साथ परिस्थिति का तंत्र कमजोर होने के कारण उन्हें आने वाले उल्का के लिए असुरक्षित बना दिया गया था।


 https://www.youtube.com/watch?v=Y8Ij9xboreA



V वा
८७९६२१२०३२


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